Jamshedpur: जमशेदपुर के करनडीह स्थित जाहेरथान परिसर में सोमवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ओलचिकी लिपि के शताब्दी वर्ष समारोह में भाग लिया। समारोह से पहले उन्होंने जाहेरथान में जाकर पूजा अर्चना की। इस अवसर पर राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी मौजूद थे।
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि संताली लेखक समाज के योगदान का आदिवासी स्वाभिमान और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने उल्लेख किया कि संगठन प्रतिवर्ष ओलचिकी लिपि के विकास और संरक्षण के लिए सक्रिय रूप से कार्य करता है। समाज के लोग अपने दैनिक जीवन से समय निकालकर इस लिपि के संरक्षण में जुटे हैं और पंडित रघुनाथ मुर्मू के कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं।
राष्ट्रपति ने संविधान के संताली अनुवाद का भी उल्लेख किया और कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी की 100वीं जयंती पर संविधान को ओलचिकी में प्रकाशित किया गया था। उन्होंने कहा कि “हमारे लोग अभी पूरी तरह शिक्षित नहीं हैं, इसलिए यह आवश्यक है कि उन्हें अपनी मातृभाषा में सभी जानकारियां उपलब्ध हों। आज जिस स्थान पर मैं उपस्थित हूं, वहां अपने समाज के लोगों का स्नेह और ईष्टदेवों का आशीर्वाद महसूस होता है। यही कारण है कि मेरा कर्तव्य है कि मैं अपने समाज और लिपि के विकास में योगदान दूं।”
राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि भारत और विश्व के विभिन्न हिस्सों में संताल समाज निवास करता है। बड़े महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक, संताल समाज की उपस्थिति है। आदिवासी समाज में स्नातक शिक्षितों की संख्या सबसे अधिक है और यह अधिकार उन्हें अपनी पहचान बनाए रखने का अवसर देता है। ओलचिकी लिपि संताल समाज की मजबूत सांस्कृतिक पहचान है और यह लोगों में एकता की भावना को बढ़ावा देती है।
इस अवसर पर राष्ट्रपति ने टाटा समूह की ओर से ओलचिकी भाषा के प्रचार-प्रसार और संरक्षण में योगदान की भी सराहना की। उन्होंने टाटा स्टील के कॉर्पोरेट सेवाओं के उपाध्यक्ष डी.बी सुंदर रमम को मंच पर सम्मानित भी किया।
राष्ट्रपति ने कहा कि कई संघर्षों के बाद ओलचिकी भाषा को मान्यता मिली है, और अब इसे और समृद्ध बनाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रयास करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को अपनी भाषा का उपयोग बढ़ाना चाहिए, ताकि ओलचिकी लिपि और भाषा का संरक्षण और संवर्धन सुनिश्चित हो सके।