Jharkhand News: पूर्व मंत्री एनोस एक्का को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है. सजा पर रोक की उम्मीद लेकर अदालत पहुंचे एनोस को राहत नहीं मिल सकी और न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी. इसके साथ ही पद के दुरुपयोग से जुड़े मामले में उनकी सजा बरकरार हो गई है.
पूर्व मंत्री एनोस एक्का द्वारा सजा पर रोक लगाने की मांग को झारखंड हाईकोर्ट ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया है. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा में फिलहाल कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा. यह फैसला गुरुवार को सुनाया गया.
न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की पीठ ने याचिका पर सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित रखा गया फैसला सुनाते हुए एनोस एक्का की अपील खारिज कर दी. इसके बाद अब पूर्व मंत्री को पद के दुरुपयोग से जुड़े मामले में सात साल की सजा काटनी होगी.
गलत पता दर्शाकर जमीन खरीदने से जुड़ा हुआ है मामला
इससे पहले सीबीआई के विशेष न्यायाधीश की अदालत ने एनोस एक्का को अपने पद का दुरुपयोग करने के मामले में दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुनाई थी. साथ ही उन पर दो लाख दस हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था. यह मामला तत्कालीन मंत्री द्वारा गलत पता दर्शाकर जमीन खरीदने से जुड़ा हुआ है.
एनोस एक्का ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि वह आय से अधिक संपत्ति के मामले में पहले ही सात साल की सजा काट चुके हैं और उस मामले में लगाया गया जुर्माना भी अदा कर चुके हैं. उनका कहना था कि पद के दुरुपयोग का मामला उसी से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस सजा पर रोक लगाई जानी चाहिए.
सीबीआई की ओर से कड़ा विरोध किया गया
सीबीआई की ओर से इस दलील का कड़ा विरोध किया गया. सीबीआई के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि दोनों मामले कानूनी रूप से अलग हैं और दोनों में दी गई सजाएं भी स्वतंत्र हैं. एक मामले में सजा पूरी हो जाने का आधार बनाकर दूसरे मामले की सजा पर रोक नहीं लगाई जा सकती. अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पहले फैसला सुरक्षित रखा था और बाद में याचिका खारिज करते हुए यह साफ कर दिया कि ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रहेगा.
कानून के सामने पद और हैसियत कोई मायने नहीं रखती
हाईकोर्ट के इस फैसले से यह संदेश साफ है कि पद के दुरुपयोग जैसे मामलों में अदालतें किसी तरह की नरमी के मूड में नहीं हैं. अलग-अलग मामलों में दी गई सजाओं को जोड़कर राहत मांगने की दलील को खारिज कर कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि कानून के सामने पद और हैसियत कोई मायने नहीं रखती. यह फैसला भ्रष्टाचार के मामलों में सख्त न्यायिक रुख को भी दर्शाता है.