Global Inequality Report: मोदी सरकार की नीतियों पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि आर्थिक विकास की रफ्तार बढ़ने के बावजूद असमानता कम नहीं हुई है. अब वैश्विक असमानता रिपोर्ट 2026 ने इस बहस को और तेज कर दिया है. रिपोर्ट बताती है कि दुनिया की 10% सबसे अमीर आबादी उतनी आय कमाती है जितनी बाकी 90% लोग मिलकर भी नहीं कमा पाते. वैश्विक स्तर पर केवल 60000 लोगों के पास आधी दुनिया यानी लगभग 4.1 अरब लोगों की कुल संपत्ति से तीन गुना ज्यादा धन है. यह आंकड़ा बताता है कि आर्थिक असमानता अब एक गंभीर वैश्विक संकट के रूप में सामने है.
पेरिस स्थित वैश्विक असमानता लैब ने जारी किया है रिपोर्ट
रिपोर्ट को पेरिस स्थित वैश्विक असमानता लैब ने जारी किया है और इसे अर्थशास्त्री लुकास शांसल, रिकार्डो गोमेज कारेरा, रोवैदा मोश्रिफ और थॉमस पिकेटी ने संपादित किया है. निष्कर्ष साफ है कि असमानता न सिर्फ बढ़ रही है बल्कि यह दुनिया भर में लोगों के जीवन और अवसरों को गहराई से प्रभावित कर रही है.
दुनिया की आधी आबादी के पास वैश्विक संपत्ति का सिर्फ 2% हिस्सा
रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की आधी आबादी यानी निचले 50% लोगों के पास कुल वैश्विक संपत्ति का सिर्फ 2% हिस्सा है और वे कुल आय का केवल 8% कमाते हैं. वहीं शीर्ष 0.001% आबादी की संपत्ति लगातार बढ़ी है. वर्ष 1995 में इनके पास 4% संपत्ति थी जो 2025 में बढ़कर 6% तक पहुंच गई.
देश में शीर्ष 10% आबादी कुल राष्ट्रीय आय का 58% कमाती है
भारत की स्थिति रिपोर्ट में बेहद चिंताजनक बताई गई है. रिपोर्ट कहती है कि भारत दुनिया के सबसे असमान देशों में शामिल है और यह स्थिति कई वर्षों से लगभग नहीं बदली है. देश में शीर्ष 10% आबादी कुल राष्ट्रीय आय का 58% कमाती है जबकि नीचे के 50% लोगों के हिस्से में सिर्फ 15% आय आती है. संपत्ति के मामले में असमानता और भी तीखी है. सबसे अमीर 10% के पास देश की कुल संपत्ति का 65% हिस्सा है और सबसे ऊपर के 1% लोगों के पास लगभग 40% संपत्ति है.
10% अमीर वर्ग 77% उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार
रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन को भी असमानता से सीधे जोड़ते हुए बताया गया है कि वैश्विक गरीब आबादी निजी संपत्ति से जुड़े कुल कार्बन उत्सर्जन का केवल 3% हिस्सा पैदा करती है जबकि 10% अमीर वर्ग 77% उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है. इसके बावजूद जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा बोझ गरीब समाज पर पड़ता है क्योंकि उनके पास सुरक्षा और बचाव के साधन बहुत कम हैं.
महिलाओं की श्रम आय में हिस्सेदारी आज भी केवल 25%
लैंगिक असमानता के मामले में भी चित्र उत्साहजनक नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं की श्रम आय में हिस्सेदारी आज भी केवल 25% है जो 1990 के स्तर के बराबर है. यदि बिना वेतन वाले कार्यों को हटाकर गणना की जाए तब महिलाएं प्रति घंटे पुरुषों की तुलना में केवल 61% आय ही अर्जित कर पाती हैं. बिना वेतन वाले कार्यों को शामिल कर लिया जाए तो यह आंकड़ा गिरकर 32% रह जाता है.
क्षेत्रीय असमानता की बात करें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है. रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक औसत आय यह नहीं दर्शाती कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कितना बड़ा अंतर मौजूद है. उत्तर अमेरिका और ओशिनिया में औसत दैनिक आय करीब 125 यूरो है जबकि सहारा के दक्षिण में अफ्रीका में यह केवल 10 यूरो है.
वैश्विक वित्तीय व्यवस्था अमीर देशों के पक्ष में
रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था अमीर देशों के पक्ष में झुकी हुई है. रिजर्व करेंसी वाले देश कम ब्याज पर कर्ज लेते हैं, उच्च दर पर उधार देते हैं और वैश्विक बचत को आकर्षित करते हैं. इसके उलट विकासशील देशों को महंगे कर्ज, कम मुनाफे और पूंजी के पलायन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. इस संरचनात्मक असमानता के कारण आर्थिक अंतर और गहरा होता जाता है.
संसाधनों का न्यायपूर्ण पुनर्वितरण किया जाए तो असमानता घट सकती है
रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि बदलाव संभव है लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी है. प्रगतिशील कर व्यवस्था अपनाई जाए और संसाधनों का न्यायपूर्ण पुनर्वितरण किया जाए तो असमानता घट सकती है. समस्या यह है कि दुनिया भर में अमीर तबके पर टैक्स का बोझ लगातार कम होता गया है और गरीबों पर अधिक भार डाला गया है. इस वजह से सरकारों के पास शिक्षा, स्वास्थ्य और जलवायु कार्रवाई जैसे क्षेत्रों में पर्याप्त संसाधन नहीं पहुंच पा रहे हैं.
रिपोर्ट का आकलन है कि यदि दुनिया के 1 लाख से कम अरबपतियों और अत्यंत धनी लोगों पर 3% का वैश्विक संपत्ति कर लगाया जाए तो हर साल 750 अरब डॉलर जुटाए जा सकते हैं. यह राशि निम्न और मध्यम आय वाले देशों के कुल शिक्षा बजट के बराबर है.
आर्थिक असमानता अब सिर्फ सामाजिक समस्या नहीं बल्कि वैश्विक संकट
रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि आर्थिक असमानता अब सिर्फ सामाजिक समस्या नहीं बल्कि वैश्विक संकट के रूप में उभर चुकी है. भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था में यह असमानता और तेज दिखाई देती है जहां आर्थिक विकास के बावजूद संसाधन कुछ हाथों में सिमटते जा रहे हैं. वैश्विक स्तर पर भी धनी देशों और बड़े कॉर्पोरेट समूहों के हितों को केंद्र में रखकर बनाई गई वित्तीय व्यवस्था असमानता को और गहरा करती है. रिपोर्ट संकेत देती है कि समाधान मौजूद हैं लेकिन निर्णायक कदम उठाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति सबसे बड़ी जरूरत है.