National Politics: भारतीय राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह ने पिछले दो दशकों में कोई विदेश यात्रा नहीं की. न आधिकारिक, न कोई निजी दौरा. उनकी आधिकारिक वेबसाइट की माने तो 2006 के बाद से विदेशी दौरे का जिक्र नहीं है. गृह मंत्री के तौर पर 6 साल से कुर्सी संभाल रहे शाह की यह आदत सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है. जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 91 देशों की धरती पर कदम रख चुके हैं वहीं शाह की एक भी विदेशी फोटो नहीं मिलती.
क्यों शाह रहते है विदेशी चकाचौंध से दूर
सियासी जानकारों का मानना है कि यह कोई मजबूरी नहीं बल्कि सोची समझी रणनीति है. अमित शाह खुद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक बनाना चाहते हैं. ऐसा नेता जो अपनी ताकत भारत की मिट्टी से ही ले. हिंदी पट्टी के वोटरों को यह संदेश जाता है कि शाह विदेशी चकाचौंध से दूर रहकर देश की जड़ों को मजबूत करने में जुटे हैं. अंग्रेजी अभिजात वर्ग से दूरी और हिंदी को राजनीतिक हथियार बनाने का उनका अंदाज भी इसी कड़ी का हिस्सा लगता है. कई विश्लेषक तो यहां तक कहते हैं कि शाह ने प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा से पहले ही यह अनौपचारिक प्रतिज्ञा ले ली है. हालांकि वे कभी खुलकर कुछ कहते नहीं लेकिन राजनीतिक हलकों में यह धारणा पक्की हो चुकी है.
गृह मंत्री रहते राजनाथ सिंह ने किए थे कई विदेशी दौरे
गृह मंत्री बनने के बाद भी शाह ने परंपरा तोड़ी. उनके पूर्ववर्ती राजनाथ सिंह ने सुरक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारियों के लिए कई देशों का दौरा किया था. लेकिन शाह ने जैसे ही गृह मंत्रालय की कमान संभाली. मंत्रालय के अफसर बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय समन्वय के लिए वे प्रतिनिधिमंडल भेजते हैं या वर्चुअल मीटिंग का सहारा लेते हैं. जरूरत पड़ी तो विदेशी राजदूतों से दिल्ली में ही बात हो जाती है. 2023 में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी से उनकी दुर्लभ मुलाकात इसका उदाहरण है.
शाह का यह स्टाइल उन्हें भाजपा समर्थकों के बीच खास पहचान देता है. सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़ाव और घरेलू मुद्दों पर फोकस उनकी छवि को और मजबूत करता है. 2006 से 2025 तक का यह लंबा सिलसिला अब राजनीतिक कथा बन चुका है. अमित शाह कब विदेश के रास्ते निकलेंगे यह तो वक्त बताएगा लेकिन उनका यह फैसला सियासी जीवन की वैचारिक दिशा का आईना जरूर है.
अमित शाह का विदेश यात्रा न करना सिर्फ व्यक्तिगत पसंद नहीं बल्कि भाजपा की घरेलू राजनीति की चालाकी है. जहां मोदी वैश्विक पटल पर भारत को चमकाते हैं वहीं शाह हिंदी हृदयभूमि में जड़ें मजबूत करते हैं. यह रणनीति विपक्ष के विदेश दौरों पर सवाल उठाने के आरोपों को भी तोड़ देती है. लेकिन गृह मंत्री के रूप में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों पर दिल्ली से ही काम चलाना आसान नहीं. वर्चुअल दौरों का सहारा तो ठीक लेकिन कभी न कभी शाह को मैदान में उतरना पड़ सकता है. फिलहाल यह संकल्प उनकी ताकत बढ़ा रहा है लेकिन आने वाले दिनों में वैश्विक चुनौतियां इसे परखेंगी. कुल मिलाकर शाह का यह फैसला सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक बन चुका है जो भाजपा को ग्रामीण भारत से जोड़े रखेगा.