Big Issue: रात के 11 बजे फोन चमकता है और एक अनजान नंबर से मैसेज गिरता है. Hi या कोई जॉब का लालच. आप सोचते हैं ये नंबर कहां से आया लेकिन इग्नोर कर देते हैं. नवंबर 2025 की एक रिसर्च ने इस सवाल का जवाब दे दिया है और जवाब कांप देने वाला है. विएना यूनिवर्सिटी के सिक्योरिटी रिसर्चर्स ने खुलासा किया कि WhatsApp के सिस्टम में एक बेसिक खामी ने पूरी यूजर डायरेक्टरी को खुला खेलने दे दिया. 3.5 अरब फोन नंबर्स प्रोफाइल फोटो और ऐक्टिव स्टेटस सब कुछ स्क्रैप हो गया. अगर कोई क्रिमिनल ये करता तो दुनिया का सबसे बड़ा डेटा लीक हो जाता.
ये कोई हैकिंग का ड्रामा नहीं बल्कि कॉन्टैक्ट डिस्कवरी फ्लॉ की चपेट में फंसी लापरवाही है. रिसर्चर्स ने एक स्क्रिप्ट चलाई जो घंटे भर में करोड़ों रैंडम नंबर्स को WhatsApp सर्वर पर प्रोब करती थी. हर बार प्रोफाइल डिटेल्स मिल जातीं जो साबित कर देतीं कि नंबर एक्टिव है और यूजर रीयल है. बिना किसी रेट लिमिट के ये खेल दिसंबर 2024 से अप्रैल 2025 तक चला. रिसर्चर्स ने 245 देशों से 3.5 अरब अकाउंट्स की लिस्ट बना ली जिसमें 2.9 मिलियन पब्लिक कीज का रीयूज भी था जो एंड टू एंड एन्क्रिप्शन को कमजोर करता है. मेटा को अप्रैल में ही बता दिया गया था लेकिन अक्टूबर तक फिक्स नहीं हुआ. अब बताओ ये लापरवाही है या जानबूझकर यूजर्स को बाजार में बेचना.
भारत के 50 करोड़ यूजर्स हैं निशाने पर
मेटा पर सवाल उठना लाजमी है. कैंब्रिज एनालिटिका का घाव अभी ताजा है जहां कंपनी ने थर्ड पार्टी का ढाल बनाया था लेकिन असल में यूजर डेटा की रक्षा ही नहीं की. यहां भी वैसा ही खेल. 2017 से रिसर्चर्स चिल्ला रहे थे कि फोन नंबर्स बिलियन यूजर्स के लिए सेफ आईडी नहीं बन सकते लेकिन मेटा ने इग्नोर किया. कॉन्वीनियंस के नाम पर प्राइवेसी दांव पर लगा दी. रिजल्ट ये कि डार्क वेब पर ये डेटा बिक रहा है और स्कैमर्स का स्वर्ग बन गया. भारत जैसे देश जहां 50 करोड़ यूजर्स हैं वो सबसे ज्यादा निशाने पर हैं. डिजिटल अरेस्ट जॉब फ्रॉड स्पैम कॉल्स की बाढ़ आ गई क्योंकि अब हर नंबर वैल्यूएबल है. एक्टिव यूजर कीमत दोगुनी हो जाती है. प्राइवेट चैट्स सेफ हैं ये तो ठीक लेकिन आपकी डिजिटल आईडी अब ब्लैक मार्केट में ट्रेड हो रही है. मेटा का बयान आया कि फ्लॉ फिक्स हो गया और कोई अकाउंट हैक नहीं हुआ लेकिन ये आधी सच्चाई है. जो डेटा निकल चुका वो तो साइबर क्रिमिनल्स के पास है और वो सालों तक स्कैमिंग का हथियार बनेगा.
+92, +84, +62 जैसे कोड्स से वीडियो कॉल्स की बौछार
भारत में हालात और बुरे हैं. +92, +84, +62 जैसे कोड्स से वीडियो कॉल्स की बौछार हो रही है जो इसी डेटा एनरिचमेंट का नतीजा है. गवर्नमेंट और मिलिट्री ईमेल से रजिस्टर्ड प्रोफाइल्स भी लीक हो गईं. रिसर्च पेपर गिटहब पर फ्री है टाइटल है हाय देयर यू आर यूजिंग WhatsApp. इसमें साफ लिखा है कि ये लीक इतना बड़ा है कि हिस्ट्री में सबसे ज्यादा लोगों को प्रभावित करता. मेटा ने बग बाउंटी प्रोग्राम से इश्यू लिया लेकिन देरी ने नुकसान कर दिया.
अब यूजर्स को क्या करें. डिफॉल्ट सेटिंग्स बदलो प्रोफाइल फोटो और अबाउट को माय कॉन्टैक्ट्स पर सेट करो. अननोन कॉलर्स साइलेंस ऑन रखो. लेकिन असल सवाल मेटा से है 8 साल की चेतावनी इग्नोर क्यों की. क्या यूजर डेटा से कमाई का कोई गड्ढा था.
मेटा की ये लापरवाही यूजर्स के लिए वाकई कयामत है क्योंकि 3.5 अरब नंबर्स का डेटा अब स्कैमर्स के पास है जो फिशिंग फ्रॉड और आइडेंटिटी थेफ्ट को आसान बना देगा. भारत जैसे डेवलपिंग कंट्री में जहां डिजिटल लिटरेसी कम है नुकसान सबसे ज्यादा होगा लाखों लोग ठगे जाएंगे और ट्रस्ट टूटेगा. कंपनी को अब सख्त रेगुलेशन का सामना करना पड़ेगा यूरोपियन GDPR से लेकर इंडियन डेटा प्रोटेक्शन बिल तक सब सक्रिय हो जाएंगे. लेकिन देरी का खामियाजा यूजर्स भुगतेंगे क्योंकि फिक्स्ड फ्लॉ के बाद भी पुराना डेटा डार्क वेब पर घूमेगा. मेटा को यूजर सेफ्टी पर प्रायोरिटी करनी होगी वरना WhatsApp जैसी सर्विस का भविष्य संकट में पड़ जाएगा. ये केस साबित करता है कि बिग टेक की सुविधा प्राइवेसी पर भारी न पड़े.