Big Breaking Bihar: बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान से महज दो दिन पहले भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद आरके सिंह ने अपनी ही सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए राजनीतिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है. मंगलवार को उन्होंने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार पर भ्रष्टाचार का ऐसा बम फोड़ा है जो चुनावी समर में गठबंधन के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है.
एक समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में आरके सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बिहार सरकार ने अडानी समूह के साथ एक लंबे समय के लिए बिजली खरीद का समझौता किया है. इस एग्रीमेंट के तहत अगले 25 वर्षों तक राज्य सरकार अडानी पावर लिमिटेड से प्रति यूनिट छह रुपये सात पैसे की दर से बिजली खरीदेगी. पूर्व सांसद ने इसे जनता के साथ धोखा बताते हुए दावा किया कि इस सौदे में कुल 62 हजार करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है.
आरके सिंह ने विस्तार से बताया कि अडानी पावर को दी गई जमीन और तय की गई बिजली दर में अनियमितताएं हैं. इनका बोझ सीधे बिहार की जनता पर पड़ेगा. उन्होंने जोर देकर कहा कि इतना बड़ा घपला होने से राज्य के लोग लंबे समय तक महंगे दामों पर बिजली खरीदने को मजबूर रहेंगे. यह आरोप इतना गंभीर है कि विपक्षी दल इसे चुनाव प्रचार का हथियार बना सकते हैं.
भाजपा नेता यहीं नहीं रुके. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस घोटाले में बिहार सरकार के कुछ मंत्री और अधिकारी लिप्त हैं. आरके सिंह ने मांग की कि पूरे मामले की केंद्रीय जांच ब्यूरो(CBI) द्वारा जांच होनी चाहिए. उनके इन बयानों ने न केवल राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है बल्कि एनडीए के नेतृत्व वाले गठबंधन के लिए चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं.
बिहार में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चूंकि यह आरोप भाजपा के ही एक प्रमुख नेता ने लगाया है इसलिए इसकी विश्वसनीयता जनता के बीच अधिक हो सकती है. विपक्षी दल जैसे राष्ट्रीय जनता दल और अन्य गठबंधन इसे भुनाने का प्रयास करेंगे. खासकर जब चुनाव का पहला चरण गुरुवार को 18 जिलों की 121 सीटों पर हो रहा है. यहां कुल 3 करोड़ 75 लाख से अधिक मतदाता 1 हजार 314 उम्मीदवारों की तकदीर का फैसला करेंगे.
यह घटना बिहार की जटिल राजनीति का एक और उदाहरण पेश करती है जहां गठबंधन के भीतर ही असंतोष चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है. आरके सिंह जैसे अनुभवी नेता का खुला बयान एनडीए की एकजुटता पर सवाल खड़े करता है. यदि विपक्ष इस मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाता है तो नीतीश कुमार की छवि को झटका लग सकता है. हालांकि भाजपा इसे आंतरिक मतभेद बताकर टालने की कोशिश करेगी लेकिन जनता के बीच भ्रष्टाचार के आरोप हमेशा संवेदनशील रहते हैं. कुल मिलाकर यह चुनावी दौड़ को और रोचक बना देगा जहां विकास और भ्रष्टाचार के बीच संतुलन तय करेगा परिणाम.