Big National News: सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों को पोर्नोग्राफी से बचाने की मांग वाली जनहित याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई करते हुए मामला चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया. मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने टिप्पणी की कि नेपाल में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के बाद क्या हुआ इस पर भी गौर करना चाहिए. अदालत ने संकेत दिया कि केवल बैन से समस्या का समाधान नहीं हो सकता.
याचिकाकर्ता अधिवक्ता बी एल जैन ने केंद्र सरकार से राष्ट्रीय नीति बनाने निगरानी तंत्र मजबूत करने और सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील सामग्री देखने पर सख्ती की मांग की है. याचिका में कहा गया कि 14 से 18 वर्ष के किशोरों तक आसानी से पहुंच रही पोर्न सामग्री उनके मानसिक सामाजिक और नैतिक विकास को क्षति पहुंचा रही है. भारत में 20 करोड़ से अधिक अश्लील वीडियो उपलब्ध हैं और कोविड काल में ऑनलाइन शिक्षा के दौरान बच्चों के पास बिना नियंत्रण वाले उपकरण आ गए.
याचिका में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69 A और भारतीय दंड संहिता की धारा 292 का हवाला देते हुए कहा गया कि सरकार के पास ब्लॉक करने का अधिकार है लेकिन प्रभावी उपयोग नहीं हो रहा. हर सेकंड हजारों पोर्न साइट्स देखी जा रही हैं और किशोरों में यौन अपराध की प्रवृत्ति बढ़ रही है.
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि अभिभावक नियंत्रण सॉफ्टवेयर उपलब्ध हैं जिनसे माता पिता बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं. पीठ ने नेपाल में बैन के बाद युवाओं के हिंसक प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए कहा कि प्रतिबंधों के सामाजिक प्रभाव को समझना जरूरी है.
यह मामला डिजिटल युग में किशोर सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की चुनौती को रेखांकित करता है. केवल प्रतिबंध पर्याप्त नहीं बल्कि शिक्षा जागरूकता और तकनीकी समाधान का समन्वय जरूरी है. अदालत की टिप्पणी नीति निर्माण में व्यावहारिक दृष्टिकोण की ओर इशारा करती है ताकि समाधान प्रभावी और टिकाऊ हो.
बिहार में वर्षों पहले लागू शराबबंदी के बावजूद अवैध मदिरा की बिक्री धड़ल्ले से जारी है. इसी प्रकार वयस्क सीरीज पर रोक के बाद भी ऐसी सामग्री आसानी से उपलब्ध है. ओटीटी प्लेटफार्मों पर अश्लील कंटेंट की भरमार है जो बिना किसी बाधा के परोसा जा रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल प्रतिबंध लगाने से कोई समस्या हल नहीं होती. समाज को स्वयं जागरूक होना होगा और समझना होगा कि कौन सी सामग्री का कितना उपभोग उचित है. कई दुष्कर्म मामलों में पाया गया कि अपराधी ने घटना से पहले पोर्न सामग्री देखी थी.
समाज में अनेक कुरीतियां व्याप्त हैं. पर्यावरण संरक्षण पर भाषण तो होते हैं लेकिन परिणाम विपरीत दिखते हैं. दिल्ली में प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि लोग शुद्ध हवा की तलाश में हरिद्वार की ओर रुख करने लगे हैं.
प्रतिबंध कानूनी उपाय हैं लेकिन सामाजिक बदलाव शिक्षा और जागरूकता से ही संभव है. पोर्नोग्राफी या शराब जैसे मुद्दों पर नैतिकता और आत्मसंयम की जरूरत है. पर्यावरण जैसे वैश्विक संकट में व्यक्तिगत जिम्मेदारी अहम भूमिका निभाती है. समाज को कानून के साथ साथ स्वयं आगे आना होगा.