International News: अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) ने अदालत को बताया है कि भारत के अधिकारियों ने अडानी समूह के अधिकारियों को समन और कानूनी दस्तावेज सौंपने में सहयोग नहीं किया है. यह मामला कथित सिक्योरिटी फ्रॉड और 265 मिलियन डॉलर की रिश्वतखोरी से जुड़ा है, जिसमें अडानी समूह पर गंभीर आरोप लगे हैं.
मिडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मामले ने अमेरिका में राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है, खासकर तब जब अमेरिकी नियामक संस्था भारतीय प्राधिकरणों से सहयोग की अपील कर रही है. SEC का कहना है कि उसने भारत के कानून मंत्रालय से कई बार संपर्क किया, लेकिन अडानी समूह के संस्थापक गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी को कानूनी दस्तावेज सौंपने की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी है.
पिछले वर्ष, ब्रुकलिन के अभियोजकों ने अडानी समूह पर आरोप लगाया था कि उसने भारत में अधिकारियों को रिश्वत देकर अडानी ग्रीन एनर्जी द्वारा उत्पादित बिजली खरीदने के सौदे को प्रभावित किया. SEC की शिकायत के मुताबिक, जिन अधिकारियों को इस कथित रिश्वत से लाभ हुआ, उन्होंने अमेरिकी निवेशकों को कंपनी की भ्रष्टाचार विरोधी नीतियों के बारे में गुमराह किया और गलत जानकारी दी.
इस मामले पर अब तक भारत के कानून एवं न्याय मंत्रालय और अडानी समूह की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. हालांकि, अडानी समूह पहले ही इन आरोपों को निराधार बता चुका है और कहा है कि वह कानूनी रूप से अपनी रक्षा करेगा और सभी आवश्यक कदम उठाएगा. जनवरी 2025 में, अडानी ग्रीन एनर्जी ने स्वतंत्र लॉ फर्मों की नियुक्ति की थी ताकि इन आरोपों की जांच की जा सके.
शुक्रवार को SEC ने न्यूयॉर्क की एक जिला अदालत को बताया कि उसने बार-बार भारत के कानून मंत्रालय से संपर्क साधा है ताकि गौतम अडानी और सागर अडानी को कानूनी दस्तावेज भेजे जा सकें. SEC ने जानकारी दी कि 14 सितंबर को भी एक ताजा संपर्क किया गया था, मगर अब तक डिलीवरी की पुष्टि नहीं मिली.
SEC ने अपने बयान में कहा कि वह हेग सर्विस कन्वेंशन के माध्यम से दस्तावेज भेजने की प्रक्रिया को जारी रखेगा और भारतीय मंत्रालय से संपर्क बनाए रखेगा. इस मामले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठाए हैं कि क्या भारत अपने बड़े कॉर्पोरेट समूहों के खिलाफ विदेशी जांच एजेंसियों के साथ सहयोग करने को तैयार है या नहीं.
अडानी समूह से जुड़े इस विवाद ने सिर्फ वित्तीय बाजारों में चिंता पैदा नहीं की है, बल्कि यह मुद्दा अब न्यायिक पारदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय कानूनी सहयोग की विश्वसनीयता से भी जुड़ गया है. अमेरिकी अदालत में चल रही कार्यवाही का अगला चरण यह तय करेगा कि क्या अडानी अधिकारियों को आधिकारिक रूप से तलब किया जा सकेगा या नहीं.
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि भारतीय अधिकारी आगे क्या कदम उठाते हैं और क्या अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच यह मामला एक बड़े परीक्षण की तरह उभरेगा.