Bihar Elections 2025: बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद से राज्य की सियासत में हलचल और तेज हो गई है. सीट बंटवारे को लेकर एनडीए और इंडिया दोनों ही गठबंधनों में मंथन और मतभेद का दौर जारी है.
अब तक हुई रैलियों और जनसभाओं से यह साफ झलकने लगा है कि नीतीश सरकार के खिलाफ जनता में असंतोष तो है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सेहत को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक ऑनलाइन बैठक के दौरान नीतीश कुमार करीब तीस सेकेंड तक हाथ जोड़े खड़े रहे. इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया जिसके बाद कई लोगों ने उनकी मानसिक स्थिति पर सवाल खड़े किए. वहीं पटना मेट्रो के उद्घाटन के बाद यात्रा के दौरान भी वे अचानक अपनी सीट से उठकर खिड़की की ओर बढ़ गए. यह दृश्य देखकर लोग हैरान रह गए और वीडियो फिर से सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. इन घटनाओं ने नीतीश कुमार की शारीरिक और मानसिक स्थिति दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
मोदी सरकार तीसरा कार्यकाल पूरा कर पाएगी या नहीं, यह बिहार चुनाव के नतीजों पर निर्भर: तेजस्वी यादव
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जैसे-जैसे नीतीश कुमार शारीरिक रूप से कमजोर हो रहे हैं, वे राजनीतिक रूप से भी अपना असर खोते जा रहे हैं. बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा कि केंद्र की मोदी सरकार तीसरा कार्यकाल पूरा कर पाएगी या नहीं, यह बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों पर निर्भर करेगा. तेजस्वी का मानना है कि अगर बिहार में एनडीए की हार होती है, तो मोदी सरकार की स्थिरता पर संकट गहरा जाएगा.
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं
दरअसल 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था. पार्टी 240 सीटों पर सिमट गई थी जबकि सरकार बनाने के लिए 272 सीटों की जरूरत होती है. इस स्थिति में एनडीए सरकार जेडीयू, टीडीपी, शिवसेना (शिंदे गुट) और एलजेपी (रामविलास) जैसे सहयोगियों के समर्थन से चल रही है. एनडीए के सहयोगियों में नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड सबसे अहम है जिसके लोकसभा में 12 सांसद हैं.
जेडीयू समर्थन वापस भी लेती है तो भी मोदी सरकार नहीं गिरेगी
नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के अलावा एनडीए में चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के सात सांसद हैं जबकि एकनाथ शिंदे की शिवसेना के पास पांच सीटें हैं. इन सबको मिलाकर एनडीए के पास 293 सांसद हैं यानी बहुमत से 21 ज्यादा. अगर जेडीयू समर्थन वापस भी ले लेती है तो भी एनडीए के पास 272 से नौ सीटें अधिक रहेंगी. इसलिए सरकार गिरने का खतरा नहीं है, लेकिन नीतीश कुमार का अलग होना मोदी सरकार की साख और नेतृत्व पर सवाल खड़े करेगा.
केंद्र में भले ही सरकार स्थिर दिखाई दे रही हो लेकिन बिहार चुनाव नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की असली परीक्षा बन गया है. लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने महाराष्ट्र और हरियाणा में जीत दर्ज की है जबकि झारखंड में हार का सामना करना पड़ा. अगर बिहार में भी भाजपा पिछड़ती है तो इससे प्रधानमंत्री के नेतृत्व पर सवाल उठ सकते हैं.
नीतीश की कमजोर स्थिति भाजपा के लिए अवसर
नीतीश कुमार की कमजोर स्थिति भाजपा के लिए अवसर और संकट दोनों लेकर आई है. एक ओर उनके कमजोर पड़ने से भाजपा को बातचीत में बढ़त मिलती है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के पास अभी तक बिहार में कोई दमदार चेहरा नहीं है. भाजपा ने सम्राट चौधरी को आगे कर नई रणनीति बनाई लेकिन प्रशांत किशोर के आरोपों ने सम्राट की छवि को कमजोर कर दिया. अब प्रशांत किशोर का उदय बिहार की राजनीति में नया मोड़ ला सकता है.
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यदि बिहार में एनडीए हारता है तो जेडीयू में टूट की संभावना है. नीतीश कुमार की नेतृत्व क्षमता पर पहले ही सवाल उठ रहे हैं. स्वास्थ्य और उम्र के कारण वे पहले जैसे सक्रिय नहीं हैं. लेकिन यह भी सच है कि राज्य में अभी कोई बड़ा सत्ता विरोधी लहर नहीं दिख रही. केंद्र की योजनाओं और कैश ट्रांसफर जैसी नीतियों ने जनता के एक वर्ग में संतोष भी पैदा किया है.
35 सालों से बिहार की राजनीति लालू यादव और नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द घूमती रही
इस बार बिहार चुनाव में फ्लोटिंग वोटरों की अहम भूमिका मानी जा रही है. कांग्रेस, ओबीसी और अति पिछड़ा वर्ग को साधने में जुटी है. यदि इस वोट बैंक का थोड़ा हिस्सा भी कांग्रेस के पक्ष में जाता है तो उसका प्रदर्शन बेहतर हो सकता है. पिछले 35 सालों से बिहार की राजनीति लालू यादव और नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द घूमती रही है. लालू यादव स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय राजनीति से दूर हैं जबकि नीतीश कुमार अब पहले जैसे प्रभावशाली नहीं रहे.
नीतीश की कमजोर स्थिति का बड़ा कारण भाजपा की राजनीति भी मानी जाती है. 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने चिराग पासवान को रोकने की कोशिश नहीं की, जिसने जेडीयू के खिलाफ उम्मीदवार उतारकर नीतीश को काफी नुकसान पहुंचाया. एलजेपी ने 135 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन केवल एक पर जीत हासिल की, फिर भी उसके 5.66 प्रतिशत वोट जेडीयू के खिलाफ चले गए जिससे जेडीयू का प्रदर्शन गिर गया.
साल 2005 में नीतीश कुमार पहली बार एनडीए के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आए थे. उस वक्त भाजपा ने 55 और जेडीयू ने 88 सीटें जीती थीं. 2010 में यह गठबंधन और मजबूत हुआ और 243 सदस्यीय विधानसभा में एनडीए ने 206 सीटें जीत लीं. लेकिन 2015 में आरजेडी और जेडीयू के गठबंधन ने भाजपा को 53 सीटों पर सीमित कर दिया.
जेडीयू के अस्तित्व की लड़ाई बन चुका बिहार विधानसभा चुनाव
नीतीश कुमार की कमजोर होती पकड़ भाजपा के लिए लाभ और हानि दोनों है. लाभ इसलिए कि अब भाजपा को जेडीयू के साथ तालमेल में मनमाफिक फैसले लेने का अवसर मिलेगा, लेकिन नुकसान यह कि नीतीश के बाद पार्टी के पास बिहार में कोई जनाधार वाला चेहरा नहीं है.
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 न केवल नीतीश कुमार बल्कि जेडीयू के अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है. यह चुनाव यह भी तय करेगा कि क्या भाजपा नीतीश के बिना बिहार में अपने दम पर खड़ी हो सकती है या नहीं. सत्ता और सेहत दोनों मोर्चों पर नीतीश की कमजोरी ने बिहार की राजनीति को अनिश्चितता के दौर में ला खड़ा किया है, जहां हर दल अपनी जमीन मजबूत करने की जद्दोजहद में जुटा है.