इस विशेष आयोजन को लेकर तैयारियां जोरों पर थी। विभिन्न जिलों के आदिवासी समुदायों को इसमें शामिल होने का न्योता दिया गया था। स्थानीय संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ-साथ अकादमिक और कानूनी विशेषज्ञों भी इस कार्यक्रम में हिस्सा लिए ताकि आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों पर ठोस समाधान निकल सके।
पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने कहा, “यह महा दरबार आदिवासी हितों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर केंद्रित हुआ। पेसा कानून, सीएनटी-एसपीटी एक्ट, भूमि अधिग्रहण, विस्थापन और आदिवासी सामाजिक संरचना जैसे विषयों पर गहन मंथन किया गया।”
ब्लिंकिट से मंगाया केला
लगभग 4 घंटे चले इस कार्यक्रम में जब पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन को भूख लगी तो एक ऑनलाइन ग्रॉसरी डिलिवरी कंपनी ब्लिंकिट के माध्यम से केला मनवाया गया, कार्यक्रम में खूब मजे से केला का लुफ्त उठाते दिखाते दिखे पूर्व मुख्यमंत्री।
पेसा कानून और CNT-SPT एक्ट पर फोकस
आदिवासी महा दरबार के मुख्य एजेंडे पेसा कानून और CNT-SPT एक्ट (छोटानागपुर- संथाल परगना टेनेंसी एक्ट) थे। ये दोनों कानून आदिवासी समुदाय की ज़मीन, जंगल और जल पर उनके पारंपरिक अधिकारों को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में इन कानूनों के क्रियान्वयन को लेकर विवाद बढ़े हैं।
झारखंड में विकास परियोजनाओं के कारण भूमि अधिग्रहण और विस्थापन लंबे समय से आदिवासी समाज के लिए गंभीर मुद्दे रहा है। महा दरबार में यह विषय भी चर्चा का केंद्र रहा।
आदिवासी समाज की एकजुटता
इस आयोजन का दूसरा बड़ा उद्देश्य आदिवासी समाज को एक मंच पर लाना था। अलग-अलग जिलों के प्रतिनिधियों, पारंपरिक मुखियाओं और सामाजिक संगठनों को आमंत्रित कर इस महा दरबार को आदिवासी स्वाभिमान और एकजुटता का प्रतीक दर्शाया गया। आयोजकों का मानना है कि अगर समुदाय संगठित और जागरूक रहेगा तो उसकी आवाज़ राज्य और केंद्र सरकार तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचेगी।
राजनीतिक महत्व
यह आयोजन न केवल सामाजिक या सांस्कृतिक बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा। इस आयोजन के ज़रिए पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन एक बार फिर आदिवासी समाज में अपनी पकड़ को मज़बूत करने की कोशिश करते दिखे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस महा दरबार के माध्यम से राज्य के राजनीतिक समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है।
नगड़ी जमीन बचाओ संघर्ष समिति
झारखंड के नगड़ी में रिम्स अस्पताल बनाए जाने के लिए चिह्नित भूमि के खिलाफ पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने राज्य सरकार का विरोध किया था। उन्होंने "नगड़ी जमीन बचाओ संघर्ष समिति" के आमंत्रण पर, नगड़ी जाकर, वहां के ग्रामीणों एवं समाज के मार्गदर्शकों के साथ, उनकी जमीन का निरीक्षण किया था और लगातार राज्य सरकार पर धावा बोल रहे है, उन्होंने एक स्पष्ट संदेश जारी करते हुए कहा था कि हमारा मकसद अस्पताल का विरोध नहीं, बल्कि आदिवासियों की जमीन बचाना है. जब सरकार के पास पहले से लैंड बैंक में काफी बंजर जमीन उपलब्ध है, स्मार्ट सिटी में सैकड़ों एकड़ की खाली जमीन है, तो फिर वो लोग गरीब आदिवासी किसानों की खेतिहर जमीन क्यों छीनना चाहते हैं? 24 अगस्त को आदिवासी समाज के साथ "हल जोतो, रोपा रोपो" के तहत, उनके खेतों में हल चलाने पहुंचे थे, हालांकि चंपाई सोरेन को हाउस अरेस्ट कर लेने के बाद ये विरोध विफल पड़ गया था। लेकिन ये कहीं से भी कहना गलत नहीं होगा की चंपाई सोरेन आदिवासी समाज में वापस अपनी जड़ें मजबूत कर रहे है।
कार्यक्रम में मुख्य रूप से पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन, इनकम टैक्स ऑफिसर और झारखंड के पूर्व मंत्री रामेश्वर उरांव की पुत्री निशा उरांव, शिक्षाविद्, वकील और 2000 से अधिक माझी बाबा शामिल हुए।