मातृ प्रेम और संतान की लंबी आयु के लिए किया जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत (जिउतिया) इस बार 13 सितंबर, शनिवार को नहाय-खाय से शुरू हुआ है। इसके अगले दिन 14 सितंबर, रविवार को पुत्रवती महिलाएं निर्जला उपवास रखते हुए पूरे दिन व्रत का पालन करती है।
जितिया का समय
अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 14 सितंबर, रविवार को सुबह 8:51 बजे से शुरू होकर 15 सितंबर, सोमवार को सुबह 5:36 बजे तक रहेगा। परंपरा के अनुसार महिलाएं रविवार की भोर में ओठगन करेंगी और व्रत का पारण सोमवार को सूर्योदय के बाद 6:27 बजे के बाद किया जाएगा।
मान्यता के अनुसार
यह व्रत मां अपनी संतान की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए रखती हैं. इस व्रत को जीवित्पुत्रिका व्रत के नाम से भी जाना जाता है. जितिया व्रत पर मान्यतानुसार गंधर्व राजा जीमूतवाहन की पूजा की जाती है.
जितिया व्रत की प्रक्रिया
सुबह स्नान कर व्रती महिलाएं भगवान जीमूतवाहन का ध्यान करके संकल्प लेती हैं। सूर्य नारायण की प्रतिमा का स्नान कराकर उनकी आराधना की जाती है। कुशा से बने भगवान जीमूतवाहन के प्रतिरूप के सामने धूप-दीप, चावल और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। मिट्टी और गोबर से चील और सियारिन की मूर्ति बनाकर पूजा की जाती है तथा सूर्यनारायण की आरती गाई जाती है। पूजन के बाद जितिया व्रत की कथा पढ़ी जाती है और आरती के बाद भोग लगाकर पूजा संपन्न होती है।
जितिया व्रत की कथा
जितिया व्रत में चील और सियारिन की कथा प्रमुख मानी जाती है। मान्यता है कि चील ने पूरी निष्ठा से व्रत इस व्रत को किया, लेकिन सियारिन ने छल किया। अगले जन्म में चील शीलावती बनी जिसे व्रत का फल मिला और वह सात पुत्रों की मां बनी, वही सियारिन कर्पूरा बनी जिसे संतान सुख की। प्राप्ति नहीं हुई। अंत में भगवान जीमूतवाहन की कृपा और व्रत के प्रभाव से कर्पूरा को भी पुत्र प्राप्त हुआ। तभी से इस व्रत का महत्व और अधिक बढ़ गया।
जितिया व्रत का पारण का समय
इस वर्ष जितिया व्रत का पारण 15 सितंबर, सोमवार को होगा। सूर्योदय के बाद सुबह 6:27 बजे के बाद व्रत तोड़ा जा सकता है।