Jharkhand High Court: रामगढ़ के गोला अंचल में जमीन अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़े छह मामलों में झारखंड हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने निचली अदालत के पुराने फैसले को रद्द कर दिया है. अब जमीन मालिकों को मिलने वाले मुआवजे की रकम नए सिरे से तय की जाएगी. मामला डभातु गांव की 9.27 एकड़ जमीन का है. इस जमीन का अधिग्रहण भैरवा जलाशय परियोजना के लिए किया गया था.
8,923 रुपये प्रति डिसमिल मिला था मुआवजा
जमीन अधिग्रहण की घोषणा 20 नवंबर 2003 को हुई थी. इसके बाद 2 दिसंबर 2003 को इसे जिला गजट में प्रकाशित किया गया. मुआवजा तय होने के बाद जमीन मालिकों ने रकम को कम बताया. उन्होंने भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 18 के तहत आपत्ति दर्ज कराई. उनका कहना था कि इलाके में जमीन की वास्तविक बाजार कीमत इससे कहीं ज्यादा थी. भूमि अधिग्रहण न्यायालय ने एक पुराने फैसले को आधार बनाकर मुआवजा 8,923 रुपये प्रति डिसमिल तय किया था.
जमीन मालिकों ने बताई ज्यादा बाजार कीमत
जमीन मालिकों ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उनकी जमीन गोला शहर से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर है. इलाके के आसपास बाजार, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, प्रखंड कार्यालय, पावर स्टेशन और राष्ट्रीय राजमार्ग जैसी सुविधाएं मौजूद हैं. उनका कहना था कि इन सुविधाओं की वजह से जमीन की बाजार कीमत ज्यादा थी. उन्होंने जमीन की उपजाऊ क्षमता और भविष्य में उसके व्यावसायिक इस्तेमाल की संभावनाओं को भी मुआवजा तय करने में शामिल करने की मांग की.
2002 के जमीन सौदों की भी हुई चर्चा
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के दौरान पाया कि निचली अदालत ने वर्ष 2002 में जमीन के 33 सौदों का उल्लेख किया था. लेकिन अदालत ने इन सौदों में जमीन के क्षेत्रफल और कीमत का पर्याप्त विश्लेषण नहीं किया था. सरकार की ओर से पेश बिक्री चार्ट और वैल्यूएशन खतियान जैसे दस्तावेजों पर भी निचली अदालत ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया. सुनवाई के दौरान जमीन मालिकों की ओर से 2002 के एक बिक्री विलेख का उदाहरण दिया गया. इसमें 6.5 डिसमिल जमीन 1,01,000 रुपये में बेची गई थी. इसके हिसाब से कीमत करीब 15,538 रुपये प्रति डिसमिल बैठती है. हालांकि हाईकोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ इस एक बिक्री के आधार पर मुआवजे की दर तय नहीं की जा सकती.
हाईकोर्ट ने कहा कि जमीन की सही कीमत तय करने के लिए उपलब्ध सभी संबंधित दस्तावेज और सबूत देखना जरूरी है. अदालत ने पाया कि निचली अदालत ने साक्ष्यों का पूरी तरह मूल्यांकन नहीं किया था. इसी वजह से पुराने फैसले को बरकरार रखने के बजाय मामलों को दोबारा भूमि अधिग्रहण न्यायालय भेजा गया है.
दस्तावेजों की खराब स्थिति पर भी कोर्ट नाराज
सुनवाई के दौरान पुराने रिकॉर्ड में मौजूद कुछ दस्तावेजों की स्थिति को लेकर भी हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई. अदालत ने पाया कि एक्सहिबिट-सी के कई पन्ने इतने छोटे थे कि उन्हें पढ़ना मुश्किल था. एक्सहिबिट-डी की कॉपी भी स्पष्ट नहीं थी. कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत से रिकॉर्ड भेजते समय सभी दस्तावेज साफ और पढ़ने योग्य होने चाहिए.
हाईकोर्ट ने 29 फरवरी 2012 को दिए गए फैसले को रद्द कर दिया. इसके साथ ही 15 मार्च 2012 को जारी अवार्ड को भी समाप्त कर दिया गया. छहों मामलों को अब दोबारा भूमि अधिग्रहण न्यायालय में भेजा गया है. निचली अदालत को हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी मिलने के चार महीने के भीतर सभी सबूतों की दोबारा जांच कर मुआवजे की नई दर तय करनी होगी.
छह अपीलों में से एक मामले में संबंधित प्रतिवादी की पहले ही मौत हो चुकी थी. 12 सितंबर 2022 के आदेश के जरिए उसके खिलाफ अपील की कार्यवाही समाप्त की जा चुकी थी. उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को मामले में शामिल करने के लिए जरूरी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई थी. इस वजह से उस अपील के उस हिस्से को अलग तरीके से समाप्त किया गया. हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब डभातु गांव की जमीन के मुआवजे का निर्धारण नए सिरे से होगा. अंतिम रकम भूमि अधिग्रहण न्यायालय सभी उपलब्ध साक्ष्यों की जांच के बाद तय करेगा.