आधी रात कृष्ण को लेकर गोकुल निकले वासुदेव
मान्यता के अनुसार कृष्ण जी का जन्म आधी रात में हुआ.जन्म के बाद वासुदेव उन्हें लेकर गोकुल की ओर निकल पड़े. कहा जाता है कि उस समय यमुना में तेज पानी था. लेकिन वासुदेव कृष्ण को लेकर नदी पार कर गए. इसके बाद बाल कृष्ण को नंद बाबा और माता यशोदा के घर पहुंचाया गया.यहीं से कान्हा के बचपन की उन लीलाओं की शुरुआत होती है, जिन्हें आज भी बड़े प्यार से याद किया जाता है. कृष्ण के जीवन की कथा आगे बढ़ती है.उन्होंने कंस का अंत किया और मथुरा को उसके अत्याचार से मुक्त कराया. बाद में महाभारत के समय कृष्ण अर्जुन के सारथी बने. कुरुक्षेत्र में उन्होंने अर्जुन को कर्म, धर्म और जीवन से जुड़ी सीख दी. श्रीमद्भगवद्गीता का यही संदेश आज भी कृष्ण के जीवन दर्शन का अहम हिस्सा माना जाता है.
व्रत से लेकर कृष्ण जन्म की पूजा तक खास तैयारी
जन्माष्टमी आते ही घरों और मंदिरों में तैयारियां शुरू हो जाती हैं. लड्डू गोपाल के लिए नए कपड़े और आभूषण तैयार किए जाते हैं. कई घरों में बाल कृष्ण के लिए छोटा सा झूला सजाया जाता है. फूलों और रोशनी से पूजा स्थल को सजाया जाता है. भक्त दिनभर व्रत भी रखते हैं. रात में कृष्ण जन्म के समय विशेष पूजा की जाती है. कई जगह दूध, दही, शहद और दूसरे पूजन सामग्री से पंचामृत तैयार कर बाल गोपाल का अभिषेक किया जाता है. इसके बाद उन्हें भोग लगाया जाता है. माखन मिश्री, मिठाई और धनिया पंजिरी जैसे प्रसाद भी कई घरों में बनाए जाते हैं.
दक्षिण भारत में गोकुलाष्टमी की खास परंपरा
मथुरा और वृंदावन में जन्माष्टमी का माहौल खास होता है. मंदिरों में सजावट होती है और कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़े कार्यक्रम किए जाते हैं. भक्त कृष्ण नाम के साथ भजन और कीर्तन करते हैं. महाराष्ट्र में जन्माष्टमी के बाद दही हांडी का आयोजन खास आकर्षण रहता है. गोविंदा की टोलियां मिलकर इंसानी पिरामिड बनाती हैं और ऊपर लटकी दही की मटकी फोड़ती हैं. गुजरात के द्वारका में भी कृष्ण जन्मोत्सव श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. द्वारकाधीश मंदिर में विशेष पूजा और धार्मिक कार्यक्रम होते हैं. दक्षिण भारत के कई हिस्सों में इसे गोकुलाष्टमी के नाम से जाना जाता है. कई घरों में चावल के घोल से बाल कृष्ण के छोटे छोटे पैरों के निशान बनाए जाते हैं.
4 सितंबर को जन्माष्टमी, जानें अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र का समय
इस साल जन्माष्टमी 4 सितंबर को है. पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 4 सितंबर को सुबह 2 बजकर 25 मिनट से शुरू होगी और 5 सितंबर की रात 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगी. रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर को रात 12 बजकर 29 मिनट से शुरू होकर रात 11 बजकर 4 मिनट तक रहेगा. कृष्ण जन्म की पूजा का समय शहर के हिसाब से अलग हो सकता है. उदाहरण के लिए कोलकाता में निशिता पूजा का समय 4 सितंबर की रात 11 बजकर 13 मिनट से 11 बजकर 59 मिनट तक बताया गया है. वहीं दिल्ली में पूजा का समय 5 सितंबर की रात 11 बजकर 57 मिनट से 12 बजकर 43 मिनट तक है. इसलिए व्रत और पूजा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए अपने शहर के पंचांग के अनुसार समय देखना बेहतर रहेगा.
कान्हा के जीवन से मिलती है मुश्किलों से लड़ने की सीख
जन्माष्टमी सिर्फ एक त्योहार नहीं है. यह कृष्ण के जीवन और उनकी सीख को याद करने का भी अवसर है. कृष्ण का जीवन बताता है कि मुश्किल हालात में भी सही रास्ते से पीछे नहीं हटना चाहिए. गीता में दिए उनके कर्म के संदेश को आज भी जीवन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. यही वजह है कि जन्माष्टमी की रात जब मंदिरों में शंख बजता है और भक्त कृष्ण जन्म का उत्सव मनाते हैं, तो माहौल में सिर्फ उत्सव नहीं होता. उस पल में भक्ति होती है. आस्था होती है. और कान्हा के उस संदेश को याद करने की कोशिश होती है कि अपना कर्म करते रहो और धर्म के रास्ते पर चलते रहो.