Jharkhand High Court News: झारखंड के पुलिस थानों में CCTV कैमरे लगाने के आदेश का पालन नहीं होने पर झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है. कोर्ट ने कहा कि बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद कैमरे नहीं लगना गंभीर मामला है. मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने DGP तदाशा मिश्रा को कारण बताओ नोटिस जारी किया है. उनसे पूछा गया है कि आदेश का पालन नहीं करने पर उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए.
11 सितंबर तक DGP को देना होगा जवाब
कोर्ट ने DGP को 11 सितंबर तक शपथपत्र दाखिल करने का मौका दिया है. अदालत ने कहा कि 18 जून के आदेश में भी अवमानना की कार्रवाई पर विचार किया गया था. इसके बावजूद राज्य सरकार को एक और मौका दिया गया, ताकि आदेश का पालन हो सके. मुख्य सचिव और गृह सचिव को भी DGP को कोर्ट के आदेश की गंभीरता बताने और अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था. लेकिन अदालत के मुताबिक अब तक किसी भी थाने में CCTV लगाने की दिशा में प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई.
टेंडर रद्द होने की दलील से कोर्ट संतुष्ट नहीं
राज्य सरकार की ओर से पहले टेंडर जारी करने और बाद में उसे रद्द करने जैसे कारण बताए जाते रहे हैं. हाईकोर्ट ने इन दलीलों को प्रथम दृष्टया संतोषजनक नहीं माना. कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस अधिकारियों की रुचि थानों में CCTV कैमरे लगाने के बजाय उन्हें नहीं लगाने में है.
8 सप्ताह में सभी थानों में लगाने होंगे CCTV
खंडपीठ ने अब पूरे राज्य के पुलिस थानों में CCTV लगाने के लिए आठ सप्ताह की समयसीमा तय की है. मुख्य सचिव और गृह सचिव को संयुक्त और व्यक्तिगत रूप से इसकी जिम्मेदारी दी गई है. उन्हें किसी दूसरे अधिकारी को जिम्मेदारी सौंपने के बजाय खुद अनुपालन सुनिश्चित करना होगा. दोनों अधिकारियों को 30 सितंबर तक अदालत में अनुपालन रिपोर्ट भी दाखिल करनी होगी. कोर्ट ने साफ किया कि अब यह देखा जाएगा कि सरकार वास्तव में कैमरे लगाने के लिए गंभीर कदम उठाती है या सुनवाई से ठीक पहले पुराने कारण बताकर समय निकालने की कोशिश करती है.
हिरासत में पिटाई की शिकायत के बाद शुरू हुआ था मामला
CCTV लगाने से जुड़ा यह मामला एक व्यक्ति की पुलिस हिरासत में कथित बेरहमी से पिटाई की शिकायत के बाद हाईकोर्ट के संज्ञान में आया था. शिकायतकर्ता के शरीर पर चोट के निशान थे. इसके बावजूद डॉक्टर ने उसे हिरासत में रखने के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट बताया था. इस मामले के बाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका शुरू की थी.
डॉक्टर की रिपोर्ट पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल
कोर्ट ने बताया कि डॉक्टर की रिपोर्ट ने उसे गंभीर रूप से चिंतित किया था. इसके बाद डॉक्टर के खिलाफ जांच का निर्देश दिया गया. हालांकि, जांच में काफी देरी हुई और 8 जुलाई 2026 की रिपोर्ट में डॉक्टर को क्लीन चिट दे दी गई. रिपोर्ट में कहा गया कि शिकायतकर्ता के बाएं पैर में फ्रैक्चर क्लिनिकल जांच के दौरान पता लगाना संभव नहीं था. कोर्ट ने इस दलील पर भी सवाल उठाया. खंडपीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता की तस्वीरों में शरीर और बाएं पैर पर गंभीर चोटें साफ दिखाई दे रही थीं.
डॉ. जया अग्रवाल को भी नोटिस
खंडपीठ ने प्रथम दृष्टया टिप्पणियों के आधार पर डॉ. जया अग्रवाल को व्यक्तिगत रूप से मामले में प्रतिवादी बनाने का निर्देश दिया है. उन्हें चांडिल अनुमंडलीय अस्पताल और स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव के माध्यम से नोटिस भेजा जाएगा. कोर्ट ने डॉ. जया अग्रवाल से पूछा है कि 8 जुलाई की वह रिपोर्ट, जिसमें उन्हें दोषमुक्त किया गया, स्वीकार क्यों की जाए. उन्हें नोटिस मिलने के दो सप्ताह के भीतर अपना शपथपत्र दाखिल करने की छूट दी गई है. मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर को होगी.