Jharkhand: झारखंड की असली पहचान सिर्फ उसके खूबसूरत पहाड़ों, जंगलों और नदियों से ही नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के लिए लड़े गए ऐतिहासिक संघर्षों से भी है। इस लंबे और कठिन आंदोलन की सबसे बुलंद आवाज "दिशोम गुरु" शिबू सोरेन थे। उनकी पहली पुण्यतिथि के अवसर पर रामगढ़ जिले के उनके पैतृक गांव नेमरा और लुकैयाटांड़ में उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि देने के लिए हजारों की संख्या में लोग जुट रहे हैं। यह आयोजन केवल एक महान नेता को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि उस महासंग्राम की यादों को ताजा करने का जरिया भी है, जिसने अलग झारखंड राज्य के सपने को साकार किया था।
जमीनी संघर्ष और महाजनी प्रथा के खिलाफ उलगुलान से शुरुआत
शिबू सोरेन का राजनीतिक और सामाजिक सफर किसी बड़े मंच या राजनीतिक परिवार से शुरू नहीं हुआ था, बल्कि इसकी जड़ें जंगलों और दूर-दराज के गांवों में थीं। उन्होंने बेहद करीब से आदिवासियों और गरीबों की लाचारी, महाजनों के भारी शोषण और उनकी जमीनों के छीने जाने के दर्द को महसूस किया था। इसी अन्याय ने उन्हें आम जनता को एकजुट करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने "जल, जंगल और जमीन" की रक्षा का नारा देकर ग्रामीणों को संगठित किया और शोषण के खिलाफ एक सशक्त उलगुलान खड़ा किया।
दिशोम गुरु- नाम नहीं, लाखों लोगों का अटूट विश्वास
झारखंड के जल-जंगल-जमीन और आदिवासियों के हक-अधिकारों की रक्षा के लिए उनके निस्वार्थ समर्पण को देखते हुए ही जनता ने उन्हें आदर से "दिशोम गुरु" (देश का गुरु) की उपाधि दी। यह केवल एक संबोधन नहीं था, बल्कि राज्य की वंचित आबादी के अटूट भरोसे का प्रतीक बन गया। गांव-गांव पैदल घूमकर उन्होंने लोगों को शिक्षा, स्वावलंबन और अपने अधिकारों के लिए लड़ने का पाठ पढ़ाया, जिससे एक पूरे समाज में चेतना का संचार हुआ।
झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन और अलग राज्य का ऐतिहासिक आंदोलन
1970 और 1980 के दशकों में जब अलग झारखंड राज्य की मांग जोर पकड़ रही थी, तब शिबू सोरेन ने इस आंदोलन को राजनीतिक और सामाजिक दिशा प्रदान की। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के गठन के बाद इस जनआंदोलन को एक मजबूत राजनीतिक मंच मिला। अनगिनत मुकदमों, राजनीतिक दबावों और व्यक्तिगत संघर्षों के बावजूद शिबू सोरेन ने कभी हार नहीं मानी और झारखंड की माटी तथा उसकी अस्मिता की लड़ाई को आगे बढ़ाते रहे।
शिक्षा से समाज सुधार- सोना सोबरन स्कूल की मिसाल
दिशोम गुरु केवल राजनीतिक अधिकार दिलाने तक सीमित नहीं रहे; उन्होंने समाज सुधार और शिक्षा को भी अपनी लड़ाई का अहम हिस्सा बनाया। उनका मानना था कि जब तक आदिवासी और मूलवासी समाज शिक्षित नहीं होगा, तब तक शोषण पूरी तरह खत्म नहीं हो सकता। लुकैयाटांड़ में स्थापित "सोना सोबरन स्कूल" उनके इसी दूरदर्शी विजन का जीवंत उदाहरण है, जो आज भी नई पीढ़ी को शिक्षित और जागरूक बना रहा है।
प्रथम पुण्यतिथि पर लुकैयाटांड़ में आदमकद प्रतिमा का अनावरण
गुरुजी की प्रथम पुण्यतिथि पर रामगढ़ के नेमरा और लुकैयाटांड़ में भव्य व भावुक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इस ऐतिहासिक अवसर पर लुकैयाटांड़ स्थित सोना सोबरन स्कूल परिसर में दिशोम गुरु शिबू सोरेन की भव्य आदमकद प्रतिमा का औपचारिक अनावरण किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, गांडेय विधायक कल्पना सोरेन, राज्य सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री, विधायक, झामुमो कार्यकर्ता और पूरे प्रदेश से आए ग्रामीण भाग ले रहे हैं।
जन-जन के दिलों में अमर है दिशोम गुरु की विरासत
शिबू सोरेन का प्रभाव आज भी झारखंड की नस-नस में बसा हुआ है। उनके समर्थक और प्रशंसक उन्हें सिर्फ एक पूर्व मुख्यमंत्री या राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि अपने संरक्षक के रूप में देखते हैं। प्रदेश के कई युवाओं और बुजुर्गों द्वारा अपने शरीर पर गुरुजी के नाम के टैटू बनवाना यह दर्शाता है कि उनका स्थान राजनीति से परे लोगों के दिलों में गहराई तक है। आज का दिन उनके दिखाए सामाजिक न्याय, संघर्ष और समर्पण के रास्ते पर चलने के संकल्प का दिन है।