New Delhi: देश की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा अप्रत्याशित घटनाक्रम देखने को मिल रहा है, जिसने संसद के पूरे समीकरण को उलट-पुलट कर दिया है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर सुलगती बगावत और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना में जारी राजनीतिक असमंजस ने केंद्र की एनडीए सरकार को एक नई और मजबूत स्थिति में खड़ा कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि राज्यों के इस आंतरिक संकट का सीधा असर आगामी मानसून सत्र में देखने को मिलेगा, जहां सरकार अब महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे बड़े व दूरगामी विधेयकों को पूरी ताकत से आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है।
बिखरती विपक्षी एकजुटता और सरकार की राह हुई आसान
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि विपक्षी दलों की एकजुटता में दरार आने से मोदी सरकार को संवैधानिक संशोधनों के लिए जरूरी आंकड़ा जुटाने में बड़ी मदद मिल सकती है। इससे पहले विपक्ष की आक्रामक और एकजुट रणनीति के कारण सरकार के कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चले गए थे, लेकिन अब जमीनी परिस्थितियां तेजी से बदल चुकी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि विपक्षी खेमे के कुछ सांसद व्हिप से अलग रुख अपनाते हैं या मतदान के दौरान सरकार के पक्ष में खड़े होते हैं, तो संसद के भीतर एनडीए का पलड़ा उम्मीद से कहीं ज्यादा भारी हो जाएगा।
बंगाल का सियासी घमासान और दिल्ली की राजनीति पर असर
इस पूरे राष्ट्रीय घटनाक्रम के केंद्र में पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीति को सबसे बड़ा कारक माना जा रहा है। टीएमसी के भीतर गहराते असंतोष और कई वरिष्ठ सांसदों द्वारा अलग राजनीतिक रास्ता तलाशने की खबरों ने दिल्ली के सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। पुख्ता सूत्रों के अनुसार, ममता बनर्जी की पार्टी के कुछ असंतुष्ट सांसद एक नए राजनीतिक मंच के साथ जाने की योजना बना रहे हैं, जिससे लोकसभा में एनडीए के समर्थक सांसदों का आंकड़ा और मजबूत होना तय है, यही वजह है कि आज पूरे देश की नजरें बंगाल पर टिकी हैं।
महाराष्ट्र का संकट और एनडीए को मिलता सीधा फायदा
बंगाल के साथ-साथ महाराष्ट्र की राजनीतिक तस्वीर भी बेहद तेजी से करवट ले रही है, जहां उद्धव ठाकरे गुट के कई सांसदों के भविष्य के कदम को लेकर कयासों का बाजार गर्म है। यदि महाराष्ट्र में भी सांसदों का एक बड़ा धड़ा बगावत की राह चुनकर अलग रास्ता अख्तियार करता है, तो इसका सीधा और तात्कालिक लाभ केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन को मिलेगा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि महाराष्ट्र और बंगाल के ये घटनाक्रम केवल प्रांतीय राजनीति तक सीमित नहीं रहने वाले, बल्कि ये दिल्ली में संसद के शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल देंगे।
दो-तिहाई बहुमत की चुनौती और बड़े विधेयकों का भविष्य
संसदीय नियमों के अनुसार, संविधान संशोधन से जुड़े किसी भी बड़े विधेयक को पारित कराने के लिए सदन में दो-तिहाई (2/3) विशेष बहुमत की अनिवार्य आवश्यकता होती है। बदली हुई परिस्थितियों में एनडीए गठबंधन विपक्षी बिखराव के चलते इस जादुई आंकड़े के बेहद करीब पहुंचता हुआ दिखाई दे रहा है। यदि कुछ प्रमुख क्षेत्रीय दलों और संभावित बागी सांसदों का परोक्ष या अपरोक्ष समर्थन सरकार को मिल जाता है, तो महिला आरक्षण और देशव्यापी परिसीमन जैसे जटिल कानूनों को अमलीजामा पहनाना सरकार के लिए काफी आसान हो जाएगा।
मानसून सत्र पर टिकी निगाहें और भविष्य का सियासी खेल
अब देश के सभी राजनीतिक दिग्गजों की निगाहें संसद के आगामी मानसून सत्र पर टिक गई हैं, जो बेहद हंगामेदार होने के आसार हैं। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि विपक्ष अपनी बची-खुची एकजुटता को बचा पाने में कामयाब होता है या फिर क्षेत्रीय दलों में बगावत का यह सिलसिला और तेज रफ्तार पकड़ता है। बहरहाल, मौजूदा स्थिति को देखकर इतना जरूर कहा जा सकता है कि संसद के भीतर सियासी खेल पूरी तरह पलट चुका है और इसका सीधा असर आने वाले समय में देश की दिशा तय करने वाले बड़े नीतिगत फैसलों पर पड़ना तय है।