Jharkhand Politics: झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाला चुनाव नामांकन शुरू होने से पहले ही राजनीतिक हलकों में चर्चा का बड़ा विषय बन गया है. एक जून से नामांकन प्रक्रिया शुरू होनी है, लेकिन सत्तारूढ़ महागठबंधन अब तक अपने उम्मीदवारों को लेकर एकमत नहीं हो पाया है. झामुमो, कांग्रेस, राजद और भाकपा माले के बीच लगातार बैठकों और मंथन का दौर जारी है. इसी बीच भाकपा माले ने भी राज्यसभा की एक सीट पर दावा ठोककर गठबंधन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.
माले ने ठोका दावा, बढ़ा दबाव
महागठबंधन के सहयोगी दल भाकपा माले ने पूर्व विधायक विनोद सिंह को राज्यसभा भेजने की मांग उठाई है. पार्टी नेताओं का कहना है कि विधानसभा चुनाव में माले ने गठबंधन को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और सरकार गठन में भी सहयोग किया था. ऐसे में अब पार्टी राज्यसभा में अपनी भागीदारी चाहती है.
माले के प्रदेश नेतृत्व का तर्क है कि उसने कभी सत्ता में हिस्सेदारी की मांग नहीं की, लेकिन संसद के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व उसकी राजनीतिक हिस्सेदारी का स्वाभाविक अधिकार है. दो विधायकों वाली माले के इस दावे ने सीटों के बंटवारे को लेकर नई बहस छेड़ दी है.
झामुमो के सामने परिवार और संगठन दोनों का संतुलन
राज्यसभा की दोनों सीटों पर झामुमो की नजर बनी हुई है, हालांकि कांग्रेस भी एक सीट की मांग पर कायम है. पार्टी के अंदर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की बड़ी बहन अंजनी सोरेन का नाम सबसे मजबूत दावेदारों में माना जा रहा है. पार्टी के भीतर यह भावना भी है कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली हुई राजनीतिक जगह पर परिवार के किसी सदस्य को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए.
अंजनी सोरेन के अलावा कल्पना सोरेन और लता सोरेन के नामों पर भी चर्चा हो रही है. हालांकि पार्टी के कई नेता मानते हैं कि कल्पना सोरेन फिलहाल राज्य की सक्रिय राजनीति में अहम भूमिका निभा रही हैं, इसलिए उन्हें दिल्ली भेजना संगठनात्मक दृष्टि से उचित नहीं होगा.
नाथवाणी और कांग्रेस की सक्रियता से बढ़ी हलचल
राजनीतिक गलियारों में उद्योगपति परिमल नाथवाणी का नाम भी चर्चा में बना हुआ है. माना जा रहा है कि वे एक बार फिर झारखंड से राज्यसभा पहुंचने की कोशिश में हैं और इसके लिए पार्टी नेतृत्व के संपर्क में हैं.
दूसरी तरफ कांग्रेस गठबंधन में अपनी हिस्सेदारी का हवाला देकर एक सीट की मांग छोड़ने को तैयार नहीं दिख रही है. यदि कांग्रेस को एक सीट मिलती है तो झामुमो के पास केवल एक सीट बचेगी. ऐसे में सहयोगी दलों को संतुष्ट रखने और उम्मीदवार चयन के बीच संतुलन बनाना झामुमो नेतृत्व के लिए आसान नहीं होगा.
भाजपा के पास संख्या कम, लेकिन मुकाबले का इरादा बरकरार
विधानसभा में संख्या बल के हिसाब से भाजपा और एनडीए फिलहाल राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए आवश्यक आंकड़े से पीछे हैं. इसके बावजूद भाजपा चुनावी मैदान से दूरी बनाने के पक्ष में नहीं दिख रही है.
पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और धनबाद के उद्योगपति नंदलाल अग्रवाल का नाम संभावित उम्मीदवारों के रूप में सामने आ रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दूसरी सीट के चुनाव में छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है.
जयराम महतो का वोट भी बन सकता है निर्णायक
दूसरी सीट के समीकरण में जेएलकेएम विधायक जयराम महतो का एक वोट भी खास महत्व रखता है. यदि मुकाबला दिलचस्प स्थिति में पहुंचता है तो क्रॉस वोटिंग, रणनीतिक समर्थन और अंतिम समय की राजनीतिक चालें चुनाव का रुख बदल सकती हैं.
संख्या बल महागठबंधन के साथ, लेकिन चुनौती भीतर से
फिलहाल विधानसभा में महागठबंधन की स्थिति मजबूत मानी जा रही है, लेकिन असली चुनौती विपक्ष से ज्यादा सहयोगी दलों की अपेक्षाओं को संतुलित करने की है. उम्मीदवारों के चयन, सीटों के बंटवारे और राजनीतिक संदेश को लेकर चल रही अंदरूनी खींचतान ने इस चुनाव को महज राज्यसभा सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि गठबंधन की एकता और राजनीतिक प्रतिष्ठा की परीक्षा बना दिया है.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में होने वाली शीर्ष स्तर की बैठकों के बाद तस्वीर साफ होगी. तब तक झारखंड का राज्यसभा चुनाव सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए रणनीति, समीकरण और प्रतिष्ठा की अहम जंग बना रहेगा.