Jharkhand News: झारखंड हाई कोर्ट ने पुलिस कस्टडी और जेल में होने वाली मौतों के साथ-साथ हिरासत में दुष्कर्म जैसे गंभीर मामलों को लेकर बेहद अहम फैसला सुनाया है. मुख्य न्यायाधीश एस एम सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्पष्ट आदेश दिया है कि भविष्य में ऐसी किसी भी घटना की स्थिति में ज्यूडिशियल इंक्वायरी (न्यायिक जांच) कराना अनिवार्य होगा. अदालत ने मानवाधिकारों की रक्षा और जांच प्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह निर्देश जारी किया है.
कानूनी प्रावधानों के तहत जांच की अनिवार्यता
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 176 (1 “अ”) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 196 (2) का हवाला दिया है. अदालत ने कहा कि इन कानूनी धाराओं के तहत हिरासत में होने वाली मौतों या बलात्कार जैसी घटनाओं की न्यायिक जांच का प्रावधान पहले से मौजूद है, जिसका कड़ाई से पालन होना चाहिए. मामले की सुनवाई के दौरान अधिवक्ता शादाब अंसारी ने पक्ष रखा, जिसके बाद अदालत ने इस व्यवस्था को राज्य में अनिवार्य रूप से लागू करने का निर्देश दिया.
कार्यपालक दंडाधिकारी के बजाय अब न्यायिक मजिस्ट्रेट करेंगे जांच
राज्य में अब तक की व्यवस्था के अनुसार, जेल या पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों की जांच कार्यपालक दंडाधिकारी यानी एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा की जाती थी. हालांकि, हाई कोर्ट के ताजा फैसले के बाद अब यह जिम्मेदारी न्यायिक मजिस्ट्रेटों के पास होगी. जानकारों का मानना है कि कार्यपालक दंडाधिकारियों द्वारा की जाने वाली जांच पर अक्सर सवाल उठते थे, लेकिन न्यायिक जांच शुरू होने से इन मामलों में निष्पक्षता और न्याय की उम्मीद बढ़ेगी.
मानकीकृत प्रक्रिया (SOP) तैयार करने का निर्देश
अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित और आसान बनाने के लिए झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (झालसा) को विशेष निर्देश दिए हैं. झालसा को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के साथ मिलकर एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर यानी एसओपी तैयार करने को कहा गया है. इस एसओपी का उद्देश्य हिरासत में होने वाली मौतों और यौन हिंसा के मामलों में न्यायिक जांच की प्रक्रिया को बिना किसी देरी के प्रभावी ढंग से संचालित करना है.