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  • 2026-05-12

Jharkhand News : झारखंड के सरकारी अस्पतालों में 40% नर्स और 25% ANM पद खाली

Jharkhand News : झारखंड के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं। राज्य के कई जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में वर्षों से रिक्त पद नहीं भरे गए हैं, जिसके कारण मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों और विभिन्न जांच रिपोर्टों में यह स्थिति गंभीर बताई गई है।


नर्स और ANM की कमी से अस्पतालों पर बढ़ा दबाव


राज्य के सरकारी अस्पतालों में करीब 40 प्रतिशत नर्सों और 25 प्रतिशत ANM पद खाली बताए जा रहे हैं। कई जिलों में स्थिति इतनी खराब है कि उपलब्ध स्टाफ को अतिरिक्त जिम्मेदारियां संभालनी पड़ रही हैं। ग्रामीण इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में इसका सबसे ज्यादा असर देखने को मिल रहा है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि स्टाफ की कमी के कारण मरीजों की जांच, इलाज और आपातकालीन सेवाओं में देरी हो रही है। कई अस्पतालों में एक-एक नर्स को कई वार्ड संभालने पड़ रहे हैं, जिससे कार्यभार लगातार बढ़ रहा है।


मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पतालों में भी हालात गंभीर


जमशेदपुर के MGM मेडिकल कॉलेज अस्पताल समेत कई बड़े सरकारी अस्पतालों में स्थायी नर्सिंग स्टाफ की भारी कमी बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार 540 बेड वाले MGM अस्पताल में जरूरत के मुकाबले बेहद कम स्थायी नर्सें कार्यरत हैं। इसके चलते अस्पताल प्रबंधन को संविदा और प्रशिक्षु नर्सों के भरोसे व्यवस्था चलानी पड़ रही है।

वहीं CAG रिपोर्ट में भी खुलासा हुआ है कि राज्य में मेडिकल ऑफिसर, विशेषज्ञ डॉक्टर, स्टाफ नर्स और पैरामेडिकल कर्मियों के हजारों पद खाली हैं। मार्च 2022 तक मेडिकल ऑफिसर और विशेषज्ञों के 61 प्रतिशत पद रिक्त पाए गए थे।


सरकार पर भर्ती प्रक्रिया तेज करने का दबाव


स्वास्थ्य सेवाओं की खराब स्थिति को लेकर सरकार पर लगातार भर्ती प्रक्रिया तेज करने का दबाव बढ़ रहा है। हाल के महीनों में स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने भी स्वीकार किया था कि राज्य में डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी है और सरकार इसे दूर करने की दिशा में काम कर रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द नियुक्तियां नहीं हुईं तो आने वाले समय में सरकारी अस्पतालों की स्थिति और गंभीर हो सकती है। इससे ग्रामीण और गरीब मरीजों को सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ेगी।

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