Jharkhand News: झारखंड हाईकोर्ट ने 9 अतिरिक्त कलेक्टरों के प्रमोशन से जुड़े मामले में अहम टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार को उनके केस पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने साफ कहा कि प्रमोशन के लिए विचार किया जाना संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है, जो समानता और अवसर के अधिकार से जुड़ा हुआ है. अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ताओं के साथ अन्याय हुआ है और प्रशासनिक चूक के कारण उनका अधिकार प्रभावित हुआ.
कोर्ट ने माना, समय पर प्रक्रिया होती तो मिल सकता था प्रमोशन
न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत में हुई सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि यदि 2023 में समय पर विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक होती और रिक्तियों की सही गणना की जाती, तो याचिकाकर्ताओं को चार्जशीट दाखिल होने से पहले ही प्रमोशन मिल सकता था. कोर्ट ने इसे गंभीर चूक मानते हुए कहा कि इस वजह से अधिकारियों के साथ अन्याय हुआ है और राज्य सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए.
वैकेंसी कम दिखाने और बाद की कार्रवाई पर उठा सवाल
मामले की पृष्ठभूमि में सामने आया कि 22 दिसंबर 2023 को हुई डीपीसी बैठक में सरकार ने केवल 14 पदों को रिक्त बताया, जबकि याचिकाकर्ताओं का दावा था कि 30 से अधिक पद खाली थे. इसी वजह से उन्हें प्रमोशन के लिए विचार ही नहीं किया गया. बाद में 20 अप्रैल 2024 को सीबीआई ने कथित दागदार भर्ती मामले में चार्जशीट दाखिल की, जिसमें इन अधिकारियों का नाम भी आया. मार्च 2025 में जब दोबारा डीपीसी हुई, तो याचिकाकर्ताओं के मामलों को सील्ड कवर में रख दिया गया, जबकि उनके जूनियर अधिकारियों को प्रमोशन दे दिया गया.
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब राज्य सरकार को इन 9 अतिरिक्त कलेक्टरों के प्रमोशन पर नए सिरे से विचार करना होगा. यह फैसला न केवल संबंधित अधिकारियों के लिए राहत भरा है, बल्कि प्रमोशन प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता की जरूरत को भी रेखांकित करता है.