Jharkhand Politics: झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) अब क्षेत्रीय राजनीति से बाहर निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में जुट गया है. अप्रैल 2025 के महाधिवेशन में पारित प्रस्ताव के अनुसार, पार्टी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में बिहार, असम, ओडिशा और बंगाल जैसे राज्यों में संगठन विस्तार को प्राथमिकता दे रही है. इसके लिए दिल्ली में संपर्क कार्यालय खोलने और "बृहद झारखंड" की परिकल्पना को धरातल पर उतारने की रणनीति बनाई गई है.
बिहार और असम चुनाव से मिला सबक
पार्टी ने चुनावी अनुभवों से अपनी रणनीति में बड़े बदलाव किए हैं. बिहार चुनाव में महागठबंधन के साथ सीटों पर सहमति न बनने के कारण झामुमो को चुनाव से दूर रहना पड़ा, जिसे पार्टी ने एक बड़े सबक के तौर पर लिया है. इसके उलट, असम में पार्टी ने समय रहते चुनाव चिह्न "तीर-धनुष" हासिल किया और 16 सीटों पर मजबूती से चुनाव लड़कर यह संदेश दिया कि वह अब गठबंधन के भरोसे बैठने के बजाय स्वतंत्र विस्तार के लिए तैयार है.
बंगाल में रणनीतिक समर्थन और भाजपा विरोधी रुख
पश्चिम बंगाल में झामुमो ने अपने उम्मीदवार उतारने के बजाय ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी का समर्थन कर राजनीतिक परिपक्वता दिखाई. हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन ने आदिवासी बहुल इलाकों में टीएमसी के लिए प्रचार किया, जिसका मकसद खुद को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के प्रमुख वैचारिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित करना था. पार्टी अब इसी मॉडल को छत्तीसगढ़ और अन्य पड़ोसी राज्यों में भी दोहराने की योजना बना रही है.
आदिवासी नेतृत्व और दिल्ली की ओर बढ़ते कदम
झामुमो अब हेमंत सोरेन को देश के सबसे बड़े आदिवासी नेता के तौर पर पेश कर रही है. पार्टी का मानना है कि भाजपा के खिलाफ वैचारिक लड़ाई लड़ने के लिए आदिवासी और वंचित वर्गों को राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट करना जरूरी है. संगठन विस्तार की इस राह में गठबंधन की चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन झामुमो ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि झारखंड की सत्ता में पकड़ मजबूत करने के बाद उसका अगला लक्ष्य दिल्ली की राजनीति में अपनी जगह बनाना है.