Jharkhand News: झारखंड के जंगलों में माओवाद के सबसे बड़े चेहरे मिसिर बेसरा उर्फ सागर की उल्टी गिनती शुरू हो गई है. खुफिया विभाग की “पिन-पॉइंट” लोकेशन मिलने के बाद चाईबासा के बाबूडेरा और कुमडीह जंगलों को सुरक्षाबलों ने “डेथ जोन” में तब्दील कर दिया है. पिछले 48 घंटों से जारी भीषण गोलीबारी के बीच, कोबरा बटालियन और झारखंड जगुआर ने 10 किलोमीटर के दायरे में ऐसा घेरा डाला है, जिसे भेद पाना किसी भी रणनीति से असंभव है. सुरक्षाबलों का यह चक्रव्यूह इतना सख्त है कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता.
रसद कटी, दस्ता पस्त: रडार पर “सागर”
घने साल के पेड़ों की छतरी के नीचे छिपे मिसिर बेसरा का संपर्क बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट चुका है. रसद और हथियारों की सप्लाई लाइन रुकने से उसके 25 लड़ाकों वाले दस्ते में भारी भगदड़ और हताशा का माहौल है. हालांकि, इस ऑपरेशन में कुछ जवान जख्मी हुए हैं, लेकिन सुरक्षाबलों ने पीछे हटने के बजाय जंगलों के भीतर नए “फॉरवर्ड कैंप” बना लिए हैं. अब हवाई ड्रोन के बजाय “ह्यूमन इंटेलिजेंस” और ग्राउंड कमांडोज की छोटी टीमें झाड़ियों की तलाशी लेते हुए मिसिर बेसरा के बिल्कुल करीब पहुंच चुकी हैं.
तीन राज्यों की नाकाबंदी, भागने के रास्ते सील
मिसिर बेसरा इस बार झारखंड की सीमा पार कर ओडिशा या छत्तीसगढ़ भागने की फिराक में था, लेकिन कोइडा और बोलानी बॉर्डर पर ओडिशा पुलिस की “वॉल” ने उसके अरमानों पर पानी फेर दिया है. चाईबासा और सरायकेला के रास्तों पर सीआरपीएफ ने मोर्चा संभाल रखा है, वहीं बस्तर जाने वाले “रेड कॉरिडोर” पर भी पैनी नजर रखी जा रही है. सामरिक रूप से मिसिर बेसरा अब एक ऐसे बॉक्स में बंद हो चुका है, जिसके चारों कोने सुरक्षा एजेंसियों के कब्जे में हैं.
सरेंडर या खात्मा: चाईबासा पुलिस का अल्टीमेटम
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यह सारंडा में माओवाद के खात्मे का “फाइनल चैप्टर” है. मिसिर बेसरा के पास अब कोई “सेफ एग्जिट” नहीं बचा है. अधिकारियों ने साफ संकेत दिए हैं कि इनामी नक्सली के पास अब केवल दो ही रास्ते हैं, या तो वह अपनी हार मानकर घुटने टेक दे या फिर मुठभेड़ में अंत के लिए तैयार रहे. जिस तरह से फोर्स ने इस बार दुर्गम इलाकों में डेरा डाला है, उससे साफ है कि यह ऑपरेशन मिसिर बेसरा के खात्मे के बिना खत्म नहीं होने वाला.