West Bengal Assembly Election: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण में अब झारखंड की राजनीति का असर भी साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक अहम रणनीतिक कदम उठाते हुए झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को चुनावी मैदान में उतारने का निर्णय लिया है। इसी क्रम में हेमंत सोरेन 18 अप्रैल से 20 अप्रैल तक पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों में चुनावी रैलियों को संबोधित करेंगे। उनका यह तीन दिवसीय दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब चुनाव अपने निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुका है और हर राजनीतिक दल अपनी पूरी ताकत झोंक रहा है।
आदिवासी बहुल क्षेत्रों पर खास फोकस
हेमंत सोरेन का यह दौरा केवल औपचारिक प्रचार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे एक सोची-समझी रणनीति के तहत तैयार किया गया है। खासतौर पर जंगलमहल और उत्तर बंगाल के आदिवासी बहुल क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए उनकी सभाओं की योजना बनाई गई है। इन इलाकों में भारतीय जनता पार्टी अपनी पकड़ मजबूत होने का दावा कर रही है, ऐसे में झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रभाव का लाभ उठाकर तृणमूल कांग्रेस अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है। माना जा रहा है कि आदिवासी समुदायों के बीच हेमंत सोरेन की पहचान और प्रभाव टीएमसी के पक्ष में माहौल बनाने में मददगार साबित हो सकता है।
विपक्षी एकजुटता का संकेत
झारखंड मुक्ति मोर्चा पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि वह पश्चिम बंगाल में चुनाव नहीं लड़ेगा और तृणमूल कांग्रेस का समर्थन करेगा। ऐसे में हेमंत सोरेन का चुनावी मंच पर उतरना विपक्षी एकजुटता का एक मजबूत संकेत माना जा रहा है। यह भी संभावना जताई जा रही है कि झारखंड के अन्य नेता भी इस प्रचार अभियान में शामिल हो सकते हैं, जिससे विपक्ष की संयुक्त ताकत का संदेश मतदाताओं तक पहुंचेगा और बीजेपी के खिलाफ एक साझा मोर्चा तैयार होगा।
बंगाल में पहला बड़ा शक्ति प्रदर्शन
झारखंड में सत्ता संभालने के बाद यह पहला अवसर होगा जब हेमंत सोरेन इस स्तर पर पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार करते नजर आएंगे। इसे उनके लिए एक बड़े राजनीतिक परीक्षण के रूप में भी देखा जा रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उनका यह दौरा चुनावी समीकरणों को किस हद तक प्रभावित करता है और तृणमूल कांग्रेस को इसका कितना लाभ मिल पाता है।