Middle East Conflict: United Nations Development Programme (यूएनडीपी) की रिपोर्ट के मुताबिक मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब वैश्विक स्तर पर स्पष्ट दिखने लगा है। एशिया प्रशांत महासागर क्षेत्र में मानव विकास पर दबाव बढ़ रहा है, जिसमें भारत भी गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है। ईंधन, मालभाड़ा और कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि से आम लोगों की क्रय शक्ति घट रही है और खाद्य असुरक्षा बढ़ रही है।
बढ़ती गरीबी और गिरता मानव विकास
रिपोर्ट में अनुमान है कि भारत की गरीबी दर 23.9 प्रतिशत से बढ़कर 24.2 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, जिससे करीब 25 लाख लोग गरीबी में धकेले जा सकते हैं। कुल गरीबों की संख्या 35.40 करोड़ तक जा सकती है। साथ ही, मानव विकास सूचकांक (HDI) की प्रगति में भी 0.03 से 0.12 वर्ष तक की गिरावट का खतरा है, जो देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति को धीमा कर सकता है।
तेल निर्भरता और महंगाई का दबाव
भारत अपनी 90 प्रतिशत से अधिक तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, जिसमें बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। इस कारण ऊर्जा कीमतों में उछाल का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। एलएनजी महंगा होने से कोयला आधारित बिजली उत्पादन बढ़ा गया है, जिससे पर्यावरण और लागत दोनों पर असर पड़ रहा है।
व्यापार, रोजगार और आपूर्ति शृंखला पर असर
संघर्ष के कारण मालभाड़ा, बीमा और परिवहन में देरी जैसी समस्याएं बढ़ी हैं। भारत का लगभग 14 प्रतिशत निर्यात और 20.9 प्रतिशत आयात इस क्षेत्र से जुड़ा है, जिससे व्यापार प्रभावित हो रहा है। छोटे उद्योगों, खासकर इस्पात, खाद्य प्रसंस्करण और रत्न-हीरा क्षेत्र को ऑर्डर रद्द होने और लागत बढ़ने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसका असर रोजगार पर भी पड़ सकता है।
खाद्य सुरक्षा और भविष्य की चुनौतियां
धन प्रेषण (रेमिटेंस) में कमी और उर्वरक आपूर्ति में बाधा से खाद्य सुरक्षा पर खतरा बढ़ रहा है, खासकर खरीफ सीजन से पहले। साथ ही, चिकित्सा उपकरणों की लागत 50 प्रतिशत तक बढ़ने और दवाओं की कीमतों में 10 से 15 प्रतिशत वृद्धि की आशंका है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट भारत के लिए मजबूत सामाजिक सुरक्षा, विविध ऊर्जा स्रोत और स्थानीय आपूर्ति शृंखलाओं को विकसित करने का अवसर भी बन सकता है।