Back to Top

Facebook WhatsApp Telegram YouTube Instagram
Push Notification

🔔 Enable Notifications

Subscribe now to get the latest updates instantly!

Jharkhand News26 – fastest emerging e-news channel.
  • 2026-04-07

Sabarimala SC Hearing: जस्टिस नागरत्ना की तीखी टिप्पणी, "माहवारी के आधार पर महिला अछूत नहीं", सबरीमाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक बहस

Sabarimala SC Hearing: सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान एक बार फिर संवैधानिक अधिकार, धार्मिक आस्था और लैंगिक समानता पर गहन बहस देखने को मिली. 9 जजों की संवैधानिक पीठ के समक्ष हुई इस सुनवाई में केंद्र सरकार और याचिकाकर्ताओं के बीच तीखे तर्क रखे गए.
माहवारी और समानता पर जस्टिस नागरत्ना की स्पष्ट टिप्पणी, अनुच्छेद 14 और 15 पर भी चर्चा
सुनवाई के दौरान जस्टिस वी.बी. नागरत्ना ने माहवारी को लेकर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि किसी महिला को हर महीने कुछ दिनों के लिए अछूत मानना स्वीकार्य नहीं हो सकता. उन्होंने कहा कि यदि तीन दिनों के लिए महिला को अलग रखा जाता है और चौथे दिन यह स्थिति समाप्त मान ली जाती है, तो यह सोच अपने आप में विरोधाभासी है.
इस दौरान संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता के अधिकार और लैंगिक भेदभाव के सवालों पर भी विस्तार से चर्चा हुई.

केंद्र का पक्ष-भारत में पितृसत्ता की परिभाषा अलग, धार्मिक आस्था को उसी नजरिए से देखने की जरूरत
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि भारत में पितृसत्ता की अवधारणा को पश्चिमी नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. उनका तर्क था कि भारतीय समाज में महिलाओं को केवल समान अधिकार ही नहीं, बल्कि कई मामलों में उच्च स्थान भी प्राप्त है. इसलिए सबरीमाला जैसे मामलों को लैंगिक भेदभाव के बजाय धार्मिक आस्था और परंपरा के संदर्भ में देखा जाना चाहिए.
उन्होंने यह भी कहा कि पहले मंदिर प्रवेश से जुड़े विवाद जातिगत आधार पर होते थे, न कि लिंग के आधार पर. ऐसे में इस मुद्दे को पूरी तरह लैंगिक भेदभाव के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा.

2018 के फैसले पर पुनर्विचार की बहस, आस्था बनाम अधिकार का टकराव
सुनवाई के दौरान 2018 के उस फैसले का भी जिक्र हुआ, जिसमें महिलाओं के प्रवेश पर रोक को छुआछूत जैसी प्रथा से जोड़ा गया था. केंद्र ने इस तुलना पर आपत्ति जताते हुए कहा कि भारत के सामाजिक और धार्मिक संदर्भों को पश्चिमी दृष्टिकोण से नहीं परखा जाना चाहिए.

सबरीमाला मामला अब केवल मंदिर प्रवेश तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह संविधान में दिए गए समानता के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन की एक बड़ी परीक्षा बन गया है. सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई आने वाले समय में इस विवाद की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी.
WhatsApp
Connect With WhatsApp Cannel !