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  • 2026-04-05

Jharkhand High Court: हाईकोर्ट की सरकार को दो टूक, प्रमोशन के लिए सिर्फ विज्ञापन देना काफी नहीं, कर्मचारियों को सीधा सूचित करना विभाग का फर्ज

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के हक में एक बेहद ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने साफ कर दिया है कि पदोन्नति (प्रमोशन) जैसी व्यक्तिगत और करियर से जुड़ी बेहद महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए केवल समाचार पत्रों में सार्वजनिक विज्ञापन निकाल देना काफी नहीं है. हाईकोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि विभागों को अपने मौजूदा कर्मचारियों के साथ सीधा संवाद स्थापित करना अनिवार्य है. कोर्ट की इस व्यवस्था के बाद अब कोई भी सरकारी विभाग केवल “अखबार में छपवा दिया था” का बहाना बनाकर किसी योग्य कर्मचारी को उसके प्रमोशन के हक से वंचित नहीं रख सकेगा.

विक्रम मंडल की याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने तय की जिम्मेदारी
यह पूरा मामला झारखंड सरकार के एक कर्मचारी विक्रम मंडल की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया. विक्रम मंडल को समय पर पदोन्नति नहीं मिली थी, जिसके खिलाफ उन्होंने न्याय की गुहार लगाते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था. इस पर सरकारी विभाग ने कोर्ट में यह लचर दलील दी थी कि पदोन्नति प्रक्रिया की पूरी जानकारी बाकायदा अखबारों में विज्ञापन के जरिए प्रकाशित की गई थी, और अगर कर्मचारी ने समय पर आवेदन नहीं किया तो यह पूरी तरह से उसकी अपनी गलती है.

अदालत ने खारिज की दलील, कहा- रोज विज्ञापन देखना कर्मचारी का काम नहीं
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने विभाग के इस गैर-जिम्मेदाराना तर्क को सिरे से खारिज कर दिया. अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि नियोक्ता (सरकार) और कर्मचारी के बीच का संबंध आपसी विश्वास और सीधे संवाद पर टिका होता है. पदोन्नति किसी भी कर्मचारी के पूरे करियर का अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. ऐसे में कोई भी विभाग आंख मूंदकर यह मानकर नहीं बैठ सकता कि दफ्तर का काम संभाल रहा हर कर्मचारी रोज सुबह उठकर अखबारों में बारीक अक्षरों में छपने वाले सरकारी विज्ञापनों को खंगाल रहा होगा.

विभागों के पास डेटा होने के बावजूद सूचित न करना बड़ी विफलता
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट अंतर समझाते हुए कहा कि सार्वजनिक विज्ञापन केवल “बाहरी नियुक्तियों” (Open Recruitment) के लिए ही उपयुक्त और तार्किक माने जा सकते हैं. कोर्ट ने इसे शुद्ध रूप से एक “प्रशासनिक विफलता” करार दिया कि विभाग ने अपने पास मौजूद कर्मचारियों के पूरे डेटाबेस का इस्तेमाल कर योग्य दावेदारों को सूचित करने का रत्ती भर भी प्रयास नहीं किया.
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