Dalma Controversy: दलमा वन्यजीव अभयारण्य (Dalma Wildlife Sanctuary) क्षेत्र में विकास और पर्यावरण संरक्षण के नाम पर हर साल पानी की तरह बहाए जा रहे पैसे पर अब स्थानीय ग्रामीणों ने सीधा मोर्चा खोल दिया है. ग्रामीणों ने तीखे सवाल पूछते हुए वन विभाग से पूछा है कि आखिर ईको-टूरिज्म, “रन फॉर गजराज” और “बर्ड फेस्टिवल” जैसे बड़े आयोजनों के नाम पर आने वाले लाखों-करोड़ों रुपयों के भारी-भरकम फंड का असली सच क्या है? हर साल सरकार से कितना पैसा मिला और उसे कहां व किन योजनाओं में ठिकाने लगाया गया, इसकी कोई सार्वजनिक रिपोर्ट आज तक सामने क्यों नहीं आई?
135 गांवों की ग्राम सभा के सामने हिसाब रखने की खुली चुनौती
ग्रामीणों ने वन विभाग के उन आरोपों पर भी कड़ी आपत्ति जताई है जिसमें कुछ स्थानीय लोगों को विकास विरोधी करार दिया जाता है. ग्रामीणों ने खुले तौर पर मांग की है कि विभाग उन कथित “विकास विरोधी” लोगों के नाम सार्वजनिक करे, ताकि सच सामने आ सके कि आखिर किसे बदनाम करने की साजिश रची जा रही है. उन्होंने खुली चुनौती दी है कि यदि वन विभाग ने सच में जमीन पर कोई विकास कार्य किया है, तो वह अपने पूरे कार्यकाल के खर्च का पूरा हिसाब-किताब दलमा क्षेत्र के सभी 135 गांवों की ग्राम सभा और ईको विकास समिति की खुली बैठक में सार्वजनिक क्यों नहीं करता?
सेंचुरी एरिया में चल रहे अवैध खनन और होटलों पर विभाग चुप क्यों?
ग्रामीणों का सबसे गंभीर और बड़ा आरोप दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी और गज परियोजना सेंचुरी के संरक्षित तराई क्षेत्रों में धड़ल्ले से चल रहे अवैध धंधों को लेकर है. ग्रामीणों का कहना है कि सेंचुरी के बेहद संवेदनशील इलाकों में लंबे समय से अवैध खनन, बड़े-बड़े होटलों का निर्माण, वेयरहाउस और ट्रांसपोर्ट कंपनियों का अवैध संचालन बेरोकटोक जारी है. हैरानी की बात यह है कि पर्यावरण और वन्य जीवों की दुहाई देने वाला वन विभाग और स्थानीय प्रशासन इन माफियाओं की खुली गुंडागर्दी और अवैध गतिविधियों पर पूरी तरह रहस्यमयी चुप्पी साधे बैठा है.
ग्रामीणों का मानना है कि जो लोग जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए आवाज उठाते हैं, वन विभाग उन्हें ही विकास का दुश्मन बताकर असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश करता है. सेंचुरी एरिया में कमर्शियल गतिविधियों के नाम पर आदिवासियों और मूलवासियों के हक-अधिकारों को कुचला जा रहा है.