War Impact: अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल के दाम बढ़ने से प्लास्टिक बनाने में इस्तेमाल होने वाले “पॉलीमर” की कीमतें आसमान छू रही हैं. युद्ध से पहले 110 रूपए प्रति किलो मिलने वाला पॉलीमर अब 160-170 रूपए तक पहुंच गया है. चूंकि बिस्किट, शैंपू, तेल और साबुन जैसे एफएमसीजी (FMCG) उत्पादों की पैकेजिंग में प्लास्टिक का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है, इसलिए कंपनियों की लागत बढ़ गई है. डिस्ट्रीब्यूटर्स के अनुसार, कच्चे माल का स्टॉक खत्म होने की कगार पर है और 25 मार्च के बाद कीमतों में बढ़ोतरी की पूरी संभावना है.
दूध-दही की पैकिंग पर भी संकट
महंगे पॉलीमर का सीधा असर डेयरी उत्पादों पर भी पड़ रहा है. दूध और दही की पैकेजिंग के लिए उपयोग होने वाली “पॉली फिल्म” और फ्लेवर्ड मिल्क की “श्रिंक रैप” की लागत बढ़ गई है. मेधा डेयरी जैसे संस्थानों के पास फिलहाल एक महीने का स्टॉक है, लेकिन वेंडर्स ने संकेत दिए हैं कि नया माल बढ़ी हुई दरों पर ही मिलेगा. लागत बढ़ने की स्थिति में डेयरी कंपनियों के पास उत्पादों के दाम बढ़ाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचेगा, जिससे आम उपभोक्ताओं की जेब ढीली होगी.
प्लास्टिक उत्पादों के दाम बढ़े
पॉलीमर की बेतहाशा कीमतों के कारण घरेलू उपयोग के प्लास्टिक सामान जैसे पानी की टंकी, बाल्टी और मग के दाम बढ़ने शुरू हो गए हैं. जमशेदपुर और आसपास के प्लास्टिक उद्यमियों के अनुसार, कच्चे माल की भारी किल्लत है और कंपनियों को एमओयू के बावजूद केवल 30 फीसदी माल ही मिल पा रहा है. पानी की टंकी की कीमतों में सवा रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी पहले ही की जा चुकी है. उद्यमियों के पास केवल 10-15 दिनों का स्टॉक शेष है, जिसके बाद संकट और गहरा सकता है.
छोटे उद्योगों पर दबाव और आपूर्ति बाधित
एफएमसीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) बाधित होने से छोटे उद्योगों पर जबरदस्त दबाव है. प्लास्टिक कैरी बैग और पीपी प्लास्टिक की कीमतों में 50-60 रूपए प्रति किलो तक का इजाफा हुआ है. टूथपेस्ट, साबुन और तेल जैसे जरूरी सामानों की पैकेजिंग महंगी होने का अंतिम बोझ उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा. अगर मध्य-पूर्व के देशों में हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो आने वाले हफ्तों में दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती हैं.