Bihar Politics: बिहार के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के सक्रिय राजनीति में आने की चर्चा जोरों पर है. कयास लगाए जा रहे हैं कि जेडीयू (JDU) के भीतर उन्हें जल्द ही कोई बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है. हाल के दिनों में मुख्यमंत्री के स्वास्थ्य को लेकर चल रही अटकलों और पार्टी के भविष्य को सुरक्षित करने की कवायद के बीच, कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं की ओर से निशांत को आगे लाने की मांग ने काफी जोर पकड़ लिया है. इस संभावित बदलाव को लेकर जेडीयू खेमे में भारी उत्साह देखा जा रहा है और माना जा रहा है कि पार्टी के उत्तराधिकार को लेकर चल रहा सस्पेंस अब खत्म होने वाला है.
इसी महीने औपचारिक घोषणा होने की संभावना
मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि निशांत कुमार इसी महीने औपचारिक रूप से राजनीतिक मैदान में कदम रख सकते हैं. हाल के कुछ हफ्तों में उनकी सार्वजनिक सक्रियता में अचानक आई तेजी इस बात की तस्दीक करती है. बीते 1 मार्च को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 75वें जन्मदिन के अवसर पर निशांत को अपने पिता के साथ बेहद करीब से देखा गया, जहाँ उन्होंने न केवल उत्सव में हिस्सा लिया बल्कि मंदिर जाकर विशेष पूजा-अर्चना भी की. सूत्रों की मानें तो दिल्ली में आयोजित होने वाली जेडीयू की आगामी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उनकी भूमिका को लेकर आधिकारिक संकेत या घोषणा की जा सकती है.
"नीतीश सेवक, मांगे निशांत" का नारा सोशल मिडिया पर चल रहा
विधानसभा चुनाव के बाद से ही निशांत कुमार की मौजूदगी ने राजनीतिक पंडितों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. गांधी मैदान में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह के दौरान उन्हें पहली पंक्ति में प्रमुखता से बैठे देखा गया था, जिसे उनके राजनीतिक लॉन्चिंग पैड के तौर पर देखा जा रहा है. हालांकि, जब भी उनसे सक्रिय राजनीति में आने को लेकर सवाल पूछे गए, उन्होंने हमेशा मुस्कराहट के साथ इसे टाल दिया. इसके बावजूद, पटना की सड़कों पर लगे "नीतीश सेवक, मांगे निशांत" जैसे नारों वाले पोस्टर और सोशल मीडिया पर चल रहे अभियान स्पष्ट करते हैं कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता उन्हें भविष्य के नेता के रूप में स्वीकार कर चुके हैं.
नीतीश कुमार के लिए फैसला आसान नहीं होगा
इस पूरे घटनाक्रम पर जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और सहयोगी दल “हम” के नेता जीतन राम मांझी जैसे दिग्गजों ने भी सकारात्मक रुख दिखाया है. पार्टी नेताओं का कहना है कि यदि कार्यकर्ता किसी को नेतृत्व करते देखना चाहते हैं, तो लोकतंत्र में उसका सम्मान होना चाहिए. हालांकि, नीतीश कुमार के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा क्योंकि वे लंबे समय से लालू परिवार पर “परिवारवाद” को लेकर हमलावर रहे हैं. ऐसे में अपने बेटे को राजनीति में उतारने के फैसले को वे किस तरह से न्यायसंगत ठहराएंगे, यह देखना दिलचस्प होगा. फिलहाल, बिहार की जनता और जेडीयू कार्यकर्ताओं की नजरें मुख्यमंत्री के अगले कदम पर टिकी हैं.