Next Iran Supreme Leader: अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन की खबरों के बाद ईरान में नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट तेज हो गई है. इजरायली और अमेरिकी हमलों के बीच उपजे इस संकट ने पूरी दुनिया की नजरें तेहरान पर टिका दी हैं. ईरानी संविधान के मुताबिक, इस शक्तिशाली पद पर केवल एक उच्च धार्मिक विद्वान ही आसीन हो सकता है. सत्ता के इस सर्वोच्च पायदान तक पहुंचने के लिए अब पर्दे के पीछे से कई प्रभावशाली शक्तियां सक्रिय हो गई हैं, जो भविष्य की दिशा तय करने में जुटी हैं.
उत्तराधिकारी की रेस में शामिल दो प्रभावशाली चेहरे
ईरान के सबसे शक्तिशाली पद के लिए वर्तमान में दो प्रमुख नाम चर्चा के केंद्र में हैं. पहला नाम अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई का है, जिन्हें व्यवस्था के भीतर एक स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता है. वहीं, दूसरा बड़ा नाम ईरान के संस्थापक अयातुल्ला खुमैनी के पोते हसन खुमैनी का है, जिनकी आम जनता के बीच गहरी पैठ और लोकप्रियता उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाती है. इन दोनों चेहरों के बीच का यह मुकाबला ईरान के भविष्य की राजनीतिक और धार्मिक दिशा तय करेगा.
विशेषज्ञों की परिषद और चयन की संवैधानिक प्रक्रिया
नए सुप्रीम लीडर का आधिकारिक चयन विशेषज्ञों की परिषद (असेम्बली ऑफ एक्सपर्ट्स) द्वारा किया जाता है, जो 88 वरिष्ठ धार्मिक विद्वानों की एक बेहद प्रभावशाली संस्था है. हालांकि कागजों पर चयन की प्रक्रिया काफी स्पष्ट दिखती है, लेकिन हकीकत में असली ताकत उन पावर ब्रोकर्स और गुटों के पास होती है जो पूरी व्यवस्था को संचालित करते हैं. इस परिषद के सदस्यों को एक ऐसे नाम पर मुहर लगानी होगी जो धार्मिक योग्यता के साथ-साथ राजनीतिक स्थिरता भी ला सके.
सत्ता के संतुलन में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की भूमिका
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (आईआरजीसी) इस समय ईरान की सबसे सशक्त सैन्य और रणनीतिक शाखा है. यह सीधे सर्वोच्च नेता को जवाबदेह होती है और देश की चुनी हुई सरकार के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त है. विशेषज्ञों का मानना है कि खामेनेई के बाद इस्लामी गणराज्य के नए स्वरूप को आकार देने में आईआरजीसी की भूमिका सबसे निर्णायक होगी. नया नेता वही बन पाएगा जिसे इस शक्तिशाली सैन्य संगठन का पूर्ण समर्थन और भरोसा प्राप्त होगा.
नेतृत्व परिवर्तन के बीच खड़ी जटिल चुनौतियां
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिलहाल ईरान में कोई भी ऐसा चेहरा नजर नहीं आता जिसके पास खामेनेई जैसी मजबूत धार्मिक और राजनीतिक सत्ता हो जो सभी धड़ों को एक साथ जोड़ सके. नए नेता के लिए क्रांतिकारी गार्ड और शक्तिशाली धार्मिक निकायों का विश्वास जीतना एक कठिन चुनौती होगी. हालिया सैन्य हमलों में कुछ प्रमुख कमांडरों की मौत ने सत्ता के आंतरिक संतुलन को भी काफी हद तक प्रभावित किया है, जिससे उत्तराधिकार का यह संघर्ष और अधिक पेचीदा हो गया है.
भविष्य का संकट और विलायत-ए-फकीह का सिद्धांत
वर्तमान राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन को अपेक्षाकृत उदारवादी माना जाता है, लेकिन हालिया युद्ध की स्थिति के बाद उनकी स्थिति अब तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई है. ईरान के “विलायत-ए-फकीह” सिद्धांत के तहत सर्वोच्च पद की जिम्मेदारी केवल एक उच्च धार्मिक विद्वान ही संभाल सकता है. चूंकि खामेनेई ने अपने जीवनकाल में किसी को औपचारिक तौर पर उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया था, इसलिए आने वाले दिनों में सत्ता के गलियारों में खींचतान और अस्थिरता बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.