Jharkhand Politics: झारखंड की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है. नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकारी खजाने से करीब 10 हजार करोड़ रुपये का कोई स्पष्ट हिसाब नहीं है. उन्होंने इसे महज वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि सत्ता के शीर्ष स्तर पर जवाबदेही से बचने की सुनियोजित साजिश करार दिया है.
मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने कांग्रेस कोटे के मंत्रियों को पूरी तरह निष्क्रिय कर दिया है और शासन-प्रशासन की सारी ताकत अपने हाथों में केंद्रित कर ली है. सोशल मीडिया पर साझा बयान में उन्होंने कहा कि जब वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने इस भारी-भरकम राशि का ब्यौरा मांगा, तो किसी भी विभाग ने जवाब देना जरूरी नहीं समझा.
मंत्री के आदेशों की अवहेलना, अफसरों पर गंभीर सवाल
नेता प्रतिपक्ष के अनुसार, वित्त मंत्री ने इस मामले को लेकर अधिकारियों की बैठक बुलाने के निर्देश दिए थे, लेकिन न तो बैठक हुई और न ही किसी अधिकारी ने मंत्री को कोई स्पष्टीकरण दिया. मरांडी ने सवाल उठाया कि जब सरकारी खजाने से पैसा निकाला गया है, तो उसका उपयोग कहां हुआ और उसका लेखा-जोखा आखिर किसके पास है?
मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री की चुप्पी
मरांडी ने दावा किया कि इस पूरे मामले से जुड़ी फाइल पिछले तीन महीनों से मुख्य सचिव के स्तर पर दबाकर रखी गई है. वहीं मुख्यमंत्री की रहस्यमयी चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है. उन्होंने कहा कि जिस तरह वित्त मंत्री के निर्देशों की खुलेआम अवहेलना हो रही है, उससे साफ संकेत मिलता है कि अधिकारियों को ऊपर से चुप रहने का इशारा मिला हुआ है.
राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा मामला
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि यह मुद्दा अब केवल झारखंड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन चुका है. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सच्चाई सामने आने से डर रही है. मरांडी ने कहा कि एक सशक्त विपक्ष के रूप में वे इस कथित घोटाले को जनता के सामने लाते रहेंगे और निष्पक्ष जांच के लिए हर स्तर पर संघर्ष करेंगे.
पूर्व वित्त मंत्री ने भी की थी गड़बड़ी की पुष्टि
गौरतलब है कि कुछ दिन पहले मीडिया से बातचीत में पूर्व वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव ने भी स्वीकार किया था कि विभागीय बैठक के दौरान वित्तीय अनियमितता सामने आई थी. इसके बाद उन्होंने अंकेक्षण विभाग को विशेष ऑडिट का निर्देश दिया था. एक साल में ऑडिट पूरा होने के बाद वित्तीय गड़बड़ी की पुष्टि हुई, जिसके आधार पर कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए थे.