पति ने छोड़ा, बेटे ने किया विश्वासघात
इस त्रासदी की शुरुआत करीब तीन दशक पहले हुई थी, जब एक पति ने अपनी पत्नी को मानसिक रूप से अस्वस्थ बताकर अस्पताल में भर्ती करा दिया था। भर्ती कराने के बाद पति और परिवार ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। सालों तक वह महिला अस्पताल की चारदीवारी के बीच अपनी यादों और अपनों की तलाश में भटकती रही।
हाल ही में, अस्पताल में तब हलचल हुई जब महिला का बेटा अपनी पत्नी के साथ उससे मिलने पहुँचा। वर्षों बाद अपने खून को सामने देख मां की आंखों में चमक आ गई थी, लेकिन उसे क्या पता था कि यह प्यार नहीं, बल्कि एक गहरी साजिश है।
कागजों पर दस्तखत और दो दिन का वो झूठा वादा
सूत्रों के अनुसार, बेटे ने मां को दुलार दिखाया और कुछ कानूनी कागजों पर उसके दस्तखत करवा लिए। जाते समय उसने मां के माथे को चूमकर वादा किया, "मां, मैं दो दिन बाद वापस आऊंगा और आपको हमेशा के लिए घर ले जाऊंगा।" मां ने अपने बेटे के उन शब्दों पर पत्थर की लकीर की तरह यकीन कर लिया।
दो दिन बीते, फिर हफ्ता और फिर महीना, लेकिन बेटा वापस नहीं आया। वह मां हर रोज अस्पताल के गेट की ओर टकटकी लगाए अपने बेटे का इंतजार करती रही। जैसे-जैसे उम्मीद टूटी, उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति बिगड़ने लगी। आखिरकार, बेटे की राह देखते-देखते उस मां ने रिनपास के उसी वार्ड में अंतिम सांस ली, जहां उसने अपनी जिंदगी के 28 साल खपा दिए थे।
मौत के बाद भी नहीं पसीजा दिल
इस कहानी का सबसे वीभत्स मोड़ तब आया, जब अस्पताल प्रशासन ने महिला की मृत्यु की सूचना उसके परिजनों को दी। जिस बेटे ने कागजों पर दस्तखत लेने के लिए ममता का ढोंग रचा था, उसने शव को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। परिवार ने अंतिम संस्कार तक की जिम्मेदारी उठाने से हाथ खींच लिए।
यह सिर्फ एक मरीज की मौत नहीं है, बल्कि हमारे समाज की संवेदनाओं की हत्या है। एक मां जिसने अपना पूरा जीवन परिवार के नाम कर दिया, उसे अंत में दो गज जमीन और अपनों का कंधा तक नसीब नहीं हुआ।
गंभीर सवाल
यह घटना हमारे आधुनिक समाज के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा है। क्या संपत्ति और स्वार्थ के आगे रिश्तों की कोई अहमियत नहीं रह गई है? प्रशासन अब महिला के लावारिस शव के अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहा है, लेकिन यह सवाल हवा में तैर रहा है कि क्या उस बेटे को कभी अपनी अंतरात्मा के सामने जवाब नहीं देना होगा।