कंपनियों और प्रशासन पर मिलीभगत का आरोप
राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन में अंबा प्रसाद ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि राज्य में विकास के नाम पर ग्रामीणों और रैयतों का दमन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि एनटीपीसी और सीसीएल जैसी कंपनियां स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर किसानों की जमीनें तो ले रही हैं, लेकिन बदले में उन्हें न तो उचित मुआवजा मिल रहा है और न ही नियमानुसार पुनर्वास या रोजगार की व्यवस्था की जा रही है।
आंदोलनकारियों पर दमन की राजनीति
अंबा प्रसाद ने विशेष रूप से बड़कागांव और आसपास के क्षेत्रों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जब गरीब ग्रामीण अपने संवैधानिक अधिकारों की मांग करते हैं, तो उन्हें पुलिस और प्रशासन के जरिए डराया-धमकाया जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकार मांगने वाले निर्दोष ग्रामीणों पर झूठे मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं।आंदोलन की आवाज दबाने के लिए लोगों को जेल भेजा जा रहा है। प्रशासनिक मशीनरी कंपनियों के एजेंट के रूप में काम कर रही है।
सड़क से न्यायालय तक जारी रहेगी जंग
मुलाकात के बाद पत्रकारों से बात करते हुए अंबा प्रसाद ने कड़े शब्दों में कहा, झारखंड की धरती के बेटों को उनकी ही जमीन से बेदखल कर उन्हें भिखारी बनाया जा रहा है। यह अन्याय अब बर्दाश्त नहीं होगा। हम इस लड़ाई को सड़क से लेकर न्यायालय तक लड़ेंगे।" उन्होंने राज्यपाल से इस मामले में हस्तक्षेप करने और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने की अपील की है।
अंबा प्रसाद के इस कदम ने एक बार फिर झारखंड में विस्थापन के पुराने घावों को हरा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि राजभवन इस पर क्या संज्ञान लेता है और राज्य सरकार व संबंधित कंपनियां इस पर क्या स्पष्टीकरण देती हैं।