Jamshedpur: देश में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को लगातार मजबूत किए जाने के दावों के बीच जमीनी सच्चाई क्या है, इसकी एक झलक हाल ही में महात्मा गांधी मेमोरियल (एमजीएम) मेडिकल कॉलेज अस्पताल में देखने को मिली। इलाज की सुविधाओं के विस्तार और पोस्ट ग्रेजुएट (पीजी) सीटों में प्रस्तावित बढ़ोतरी से पहले अस्पताल की वास्तविक स्थिति का जायजा लेने पहुंची स्वास्थ्य विभाग की तीन सदस्यीय टीम को कई गंभीर और बुनियादी खामियों का सामना करना पड़ा। यह निरीक्षण सिर्फ एक अस्पताल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों की व्यापक व्यवस्थागत चुनौतियों की ओर भी इशारा करता है।
इमरजेंसी से ऑपरेशन थियेटर तक अव्यवस्था
स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त सचिव ललित नारायण शुक्ला, चिकित्सा निदेशक डॉ. एस. सरकार और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की टीम ने सबसे पहले इमरजेंसी, ओपीडी, वार्ड और ऑपरेशन थियेटर का निरीक्षण किया। इमरजेंसी विभाग की अव्यवस्थित स्थिति देखकर अधिकारी नाराज़ नजर आए। लिफ्टों में नियमित रूप से लिफ्टमैन की तैनाती न होना, पुराने और अनुपयोगी उपकरणों का इस्तेमाल और ऑपरेशन थियेटर के बाहर मरीजों व उनके परिजनों के लिए बैठने की समुचित व्यवस्था का अभाव साफ तौर पर दिखा। अधिकारियों ने माना कि इतने बड़े और संसाधनों से लैस अस्पताल में ऐसी बुनियादी कमियां बहुत चिंताजनक हैं।
संसाधन हैं, फिर भी व्यवस्था क्यों कमजोर?
निरीक्षण के बाद आयोजित समीक्षा बैठक में संयुक्त सचिव ने अस्पताल प्रबंधन पर सीधे सवाल दागे। प्राचार्य, उपाधीक्षक और सभी विभागाध्यक्षों से उन्होंने पूछा कि जब अस्पताल के पास आधुनिक भवन, पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर और अनुभवी चिकित्सकों की टीम मौजूद है, तो फिर संचालन स्तर पर व्यवस्थाएं दुरुस्त क्यों नहीं हो पा रही हैं। अधिकारियों का कहना था कि कई मामलों में सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल निजी अस्पतालों से कम संसाधन वाले नहीं हैं, इसके बावजूद बार-बार अव्यवस्था को लेकर चर्चा में रहना दुर्भाग्यपूर्ण है।
दवाओं की उपलब्धता पर संदेह
बैठक के दौरान दवाओं के मुद्दे ने भी तूल पकड़ा। संयुक्त सचिव ने सवाल उठाया कि यदि अस्पताल में बाहर की दवाएं नहीं लिखी जा रही हैं, तो फिर अस्पताल परिसर के बाहर दवा दुकानों पर मरीजों की भारी भीड़ क्यों दिखाई देती है। इसे गंभीर विषय बताते हुए उन्होंने स्पष्ट संकेत दिए कि इस मामले की गहन जांच की जाएगी और भविष्य में किसी भी तरह की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
फंड होने के बावजूद खर्च नहीं
निरीक्षण के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा प्रत्येक विभागाध्यक्ष को विकास कार्यों के लिए पांच-पांच लाख रुपये की राशि उपलब्ध कराई गई है, लेकिन इसके बावजूद कई जगहों पर फंड का उपयोग नहीं हो पा रहा। इस पर संयुक्त सचिव ने नाराज़गी जताते हुए सवाल किया कि जब धन की कमी नहीं है, तो फिर कार्यों में देरी क्यों हो रही है। यह स्थिति सरकारी स्वास्थ्य बजट के जमीनी स्तर पर सही इस्तेमाल को लेकर एक बड़े राष्ट्रीय सवाल को जन्म देती है।
सुपर स्पेशलिटी सेवाओं पर फोकस
निरीक्षण में हार्ट, न्यूरो, कैंसर और प्लास्टिक सर्जरी जैसी सुपर स्पेशलिटी यूनिट्स पर विशेष रूप से चर्चा हुई। अधिकारियों ने जानकारी दी कि इन विभागों के लिए विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति की जा चुकी है। संयुक्त सचिव ने निर्देश दिया कि सभी सुपर स्पेशलिटी यूनिट्स को प्राथमिकता के आधार पर जल्द से जल्द शुरू किया जाए, ताकि गंभीर मरीजों को इलाज के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन न करना पड़े।
कैथ लैब में देरी, जल्द समाधान के निर्देश
कैथ लैब के निरीक्षण के दौरान अंदरूनी निर्माण कार्य अधूरा पाया गया। इस पर भवन निर्माण विभाग को निर्देश दिए गए कि रांची स्थित रिम्स के हृदय रोग विशेषज्ञों से समन्वय स्थापित कर शीघ्र डीपीआर तैयार की जाए, जिससे कैथ लैब को जल्द चालू किया जा सके।
एमजीएम मेडिकल कॉलेज अस्पताल का यह निरीक्षण सिर्फ एक संस्थान की समीक्षा नहीं रहा, बल्कि उस सच्चाई को सामने लाया जहां संसाधन और बजट उपलब्ध होने के बावजूद कमजोर प्रबंधन और सुस्त क्रियान्वयन मरीजों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। यह सवाल अब केवल एमजीएम तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ गया है।