हाशिये से मुख्यधारा तक का सफर
पाकुड़ के सुदूरवर्ती गांवों, कच्ची सड़कों और जंगलों के बीच बसे टोलों में लोकतंत्र की अलख जगाना आसान नहीं था। प्रोजेक्ट समावेश के जरिए प्रशासन ने उन समुदायों तक पहुंच बनाई, जो अब तक मतदाता सूची से दूर थे। इनमें मुख्य रूप से ट्रांसजेंडर समुदाय और दिव्यांगजन, अति पिछड़ी जनजातियाँ, पहली बार मतदान करने वाले युवा जिले की टीम ने संकोच, अविश्वास और सूचना के अभाव जैसी बाधाओं को घर-घर संपर्क और निरंतर संवाद के जरिए पार किया।
जमीनी नायकों की मेहनत को मिली पहचान
इस उपलब्धि के असली नायक वे बूथ लेवल ऑफिसर हैं, जिन्होंने तेज धूप और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों की परवाह किए बिना हर घर का दरवाजा खटखटाया। एयरो, एआरओ और सुपरवाइजरों की निगरानी में यह सुनिश्चित किया गया कि कोई भी पात्र नागरिक पंजीकरण से वंचित न रहे। यह प्रयास सिर्फ फॉर्म भरने तक सीमित नहीं था, बल्कि लोगों में यह भरोसा जगाने का था कि आपका वोट, आपकी ताकत है। यह सम्मान पाकुड़ के हर उस कर्मवीर का है जिसने घंटों की परवाह किए बिना लोकतंत्र के लिए पसीना बहाया। यह पुरस्कार उन अनगिनत पैरों की गूंज है जिन्होंने दुर्गम रास्तों को नापकर लोकतंत्र को घर-घर पहुँचाया।
पाकुड़ के लिए गौरव का क्षण
आज जब राष्ट्रीय मंच पर पाकुड़ का नाम गूंजा, तो यह सिर्फ एक सरकारी कार्यालय की नहीं, बल्कि जिले के सामूहिक जुनून की जीत साबित हुई। राष्ट्रपति के हाथों मिला यह सम्मान इस बात का प्रतीक है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो सीमित संसाधनों में भी लोकतंत्र को जीवंत और समावेशी बनाया जा सकता है।