Jharkhand News: झारखंड की संताली भाषा और उसकी पारंपरिक ओलचिकि लिपि अब तकनीक के सहारे नए दौर में कदम रखने जा रही है. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लंबे समय से उपेक्षित रही इस लिपि को पहचान दिलाने के लिए तोरजोमा नाम का सॉफ्टवेयर विकसित किया जा रहा है, जो अनुवाद को सरल और सुलभ बनाएगा.
तोरजोमा सॉफ्टवेयर के जरिए ओलचिकि से हिंदी और अंग्रेजी के साथ अन्य जनजातीय भाषाओं में अनुवाद संभव होगा. संताली भाषा में तोरजोमा का अर्थ ही अनुवाद होता है और यही इसका मूल उद्देश्य भी है कि भाषा की दीवारें टूटें और संवाद का रास्ता खुले.
ओलचिकि की ऐतिहासिक जड़ें और आज की जरूरत
ओलचिकि लिपि का आविष्कार 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू ने किया था. तीस अक्षरों वाली यह लिपि संथाल समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का आधार है. अब तक डिजिटल अनुवाद की कमी के कारण यह भाषा तकनीकी दुनिया से कटे दायरे में थी.
एनआईटी जमशेदपुर की टीम संभाल रही कमान
इस परियोजना पर एनआईटी जमशेदपुर के कंप्यूटर साइंस एंड टेक्नोलॉजी विभाग की टीम काम कर रही है. असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. कौशलेंद्र कुमार सिंह के नेतृत्व में शोधार्थी और इंटर्न मिलकर सॉफ्टवेयर को आकार दे रहे हैं. टीम के अनुसार ओलचिकि से अंग्रेजी में अनुवाद फिलहाल सफल हो चुका है. हिंदी और अन्य जनजातीय भाषाओं के लिए काम तेजी से आगे बढ़ रहा है और 2026 के अंत तक परियोजना पूरी होने की उम्मीद है.
लो-रिसोर्स भाषाओं के लिए बनेगा साझा डेटाबेस
संताली जैसी जनजातीय भाषाओं के लिए एसएएन टीएमवीआई नाम से विशेष डेटाबेस तैयार किया गया है. प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद इसे सार्वजनिक किया जाएगा ताकि शोध और भाषा संरक्षण को बढ़ावा मिल सके.
तोरजोमा सिर्फ एक सॉफ्टवेयर नहीं बल्कि भाषा और तकनीक के बीच पुल बनने की कोशिश है. यदि यह पहल सफल होती है तो संताली और अन्य जनजातीय भाषाओं को डिजिटल पहचान मिलेगी और झारखंड की सांस्कृतिक विरासत नई पीढ़ी तक तकनीक के जरिए सुरक्षित पहुंच सकेगी.