एक त्रिआयामी थीम, पूजा, कला और राष्ट्रवाद
इस वर्ष के आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अभिनव थीम थी। एकेडमी ने मां सरस्वती की आराधना के साथ-साथ झारखंड की समृद्ध जनजातीय कला और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की गौरवशाली विरासत को एक सूत्र में पिरोया। पंडाल की सजावट में जहां एक ओर स्थानीय कला की झलक दिखी, वहीं दूसरी ओर भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन के अनछुए पहलुओं को प्रदर्शित किया गया।
इतिहास से साक्षात्कार, नेताजी का सांस्कृतिक संघर्ष
आयोजन में विशेष रूप से यह दर्शाया गया कि कैसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपने कॉलेज के दिनों में सरस्वती पूजा आयोजित करने के अधिकार के लिए संघर्ष किया था। इतना ही नहीं, जेल की सलाखों के पीछे रहने के बावजूद उन्होंने अपनी सांस्कृतिक आस्था और मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। चूँकि 23 जनवरी को नेताजी की जयंती भी थी, इसलिए एकेडमी ने इसे पराक्रम दिवस और ज्ञान पर्व के एक गरिमामय मिलन के रूप में मनाया।
विरासत से जुड़ते नौनिहाल
संस्थान के निदेशक नीलाद्रि चट्टराज की इस अनूठी परिकल्पना का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान से बाहर निकालकर वास्तविक इतिहास से रूबरू कराना था। हम चाहते थे कि बच्चे केवल इतिहास पढ़ें नहीं, बल्कि उसे महसूस करें। नेताजी के संघर्षों और झारखंड की जड़ों को समझकर ही वे एक सजग नागरिक बन सकते हैं।
सावित्री एकेडमी परिवार के सामूहिक प्रयासों से आयोजित इस कार्यक्रम ने विद्यार्थियों में सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रवाद का बीज बोने का सफल कार्य किया। बच्चों ने न केवल कलात्मक कौशल सीखा, बल्कि नेताजी के दिल्ली चलो के नारे के पीछे छिपी वैचारिक शक्ति को भी समझा।