Jharkhand News: राज्य के नर्सिंग होम और अस्पतालों से निकलने वाले बायो मेडिकल वेस्ट के निस्तारण को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर झारखंड हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने रिम्स प्रबंधन की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए. कोर्ट ने पूछा कि बायो मेडिकल वेस्ट के निस्तारण से जुड़ा टेंडर अब तक क्यों पूरा नहीं हो सका है.
खंडपीठ ने जताई नाराजगी
झारखंड ह्यूमन राइट कन्फेडरेशन की ओर से दाखिल याचिका पर सोमवार को चीफ जस्टिस एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने रिम्स के जवाब पर असंतोष व्यक्त किया. अदालत ने यह भी कहा कि पूर्व में दिए गए निर्देशों का अब तक समुचित अनुपालन नहीं किया गया है.
टेंडर प्रक्रिया पर मांगा गया शपथ पत्र
कोर्ट ने रिम्स के डायरेक्टर को निर्देश दिया कि बायो मेडिकल वेस्ट के निस्तारण के लिए टेंडर को पूरा करने की दिशा में अब तक क्या कदम उठाए गए हैं, इसका विवरण अगली सुनवाई में शपथ पत्र के माध्यम से प्रस्तुत किया जाए. मामले की अगली सुनवाई 2 फरवरी को निर्धारित की गई है.
याचिकाकर्ता ने उठाया देरी का मुद्दा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि रिम्स में बायो मेडिकल वेस्ट डिस्पोजल मैनेजमेंट के लिए नया टेंडर अभी तक अंतिम रूप से पूरा नहीं हो पाया है. इस पर अदालत ने रिम्स के जवाब को पर्याप्त नहीं माना.
रिम्स ने दी प्रक्रिया जारी रहने की जानकारी
रिम्स की ओर से कोर्ट को बताया गया कि बायो मेडिकल वेस्ट डिस्पोजल मैनेजमेंट के लिए नया टेंडर निकाला गया है और कंपनियों को आमंत्रित किया गया है. रिम्स में ठोस कचरा, सूखा कचरा और बायो मेडिकल वेस्ट सहित सभी प्रकार के कचरे के निष्पादन की व्यवस्था प्रस्तावित है. इससे पहले रिम्स परिसर में जगह-जगह कचरा फेंके जाने को लेकर भी कोर्ट नाराजगी जता चुकी है.
नियम लागू करने की मांग
याचिका में यह भी मांग की गई है कि झारखंड में एनवायरमेंटल प्रोटेक्शन एक्ट के तहत बायो मेडिकल वेस्ट डिस्पोजल मैनेजमेंट रूल को प्रभावी रूप से लागू किया जाए. याचिकाकर्ता का कहना है कि अस्पतालों, क्लीनिक और नर्सिंग होम से निकलने वाले बायो मेडिकल वेस्ट का निष्पादन निर्धारित नियमों के अनुसार होना अनिवार्य है.
बायो मेडिकल वेस्ट पर लापरवाही को बर्दाश्त नहीं
हाई कोर्ट की सख्ती यह संकेत देती है कि बायो मेडिकल वेस्ट जैसे संवेदनशील मुद्दे पर लापरवाही को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. रिम्स जैसे प्रमुख सरकारी संस्थान से अपेक्षा है कि वह नियमों का पालन कर एक उदाहरण पेश करे. अगली सुनवाई में पेश होने वाला शपथ पत्र तय करेगा कि मामला समाधान की दिशा में बढ़ता है या अदालत को और कड़े निर्देश देने पड़ते हैं.