उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने अपने लंबे शासनकाल में पेसा कानून को लागू नहीं किया, वही आज उस पर सवाल उठा रहे हैं.यह दुर्भाग्यपूर्ण है
सतीश पौल मुंजनी ने स्पष्ट किया कि पेसा नियमावली संविधान, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश, हाई कोर्ट की टिप्पणियों और व्यापक जन-परामर्श के बाद तैयार की गई है. सभी सांसदों और विधायकों से चर्चा के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया है. इसका मकसद आदिवासी स्वशासन को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे कानूनी ताकत देना है.
ग्राम सभा को मिले स्पष्ट अधिकार
उन्होंने कहा कि पेसा नियमावली के तहत पहली बार ग्राम सभा को साफ-सुथरे कानूनी अधिकार, ढांचा और प्रक्रिया दी गई है, ताकि कानून केवल कागजों में न रहे. यह कहना गलत है कि इससे ग्राम सभा कमजोर होगी. साथ ही उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि संथाल समाज सहित 35 आदिवासी जातियों की आस्था और परंपराओं पर हमले का आरोप पूरी तरह झूठा है.संविधान और पेसा कानून में आदिवासी समाज की सामाजिक, धार्मिक और पारंपरिक व्यवस्थाओं को पूरी मान्यता दी गई है.नियमावली में इन्हें खत्म करने का कोई प्रावधान नहीं है.
जल–जंगल–जमीन पर ग्राम सभा की भूमिका बरकरार
उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन से ग्राम सभा को दूर करने का आरोप भी बेबुनियाद है. पेसा के तहत ग्राम सभा को सामुदायिक संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग में अहम भूमिका दी गई है. प्रशासनिक जवाबदेही तय करना ग्राम सभा को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसके फैसलों को जमीन पर लागू कराना है.
राजनीतिक जमीन खिसकने से घबराई भाजपा
सतीश पौल मुंजनी ने कहा कि झारखंड बने 25 साल हो चुके हैं. इस दौरान सबसे ज्यादा समय तक भाजपा सत्ता में रही, लेकिन तब पेसा और आदिवासी हितों की याद नहीं आई. आज जब गठबंधन सरकार पेसा नियमावली को लागू कर रही है, तो भाजपा बेचैन है और झूठ फैलाकर जनता को गुमराह कर रही है.