Jamshedpur Big News: गोकुल नगर के जीत महतो मौत मामले ने अब एक नया मोड़ ले लिया है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस केस को रजिस्टर कर लिया है और इसे डायरी नंबर 372/IN/2026 के तहत दर्ज किया गया है. आयोग की ओर से इसकी जानकारी मानवाधिकार कार्यकर्ता मनोज मिश्रा को ई-मेल के जरिए दी गई है. एनएचआरसी की एंट्री के साथ ही यह मामला अब सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं रहा, बल्कि सीधे सिस्टम की जवाबदेही से जुड़ गया है.
गिरफ्तारी के वक्त ही जीत की तबीयत खराब थी
यह मामला एमजीएम थाना क्षेत्र के गोकुल नगर निवासी 22 वर्षीय जीत महतो से जुड़ा है. 29 दिसंबर 2025 को पुलिस ने उसे मोबाइल चोरी के आरोप में हिरासत में लिया था. परिजनों का कहना है कि गिरफ्तारी के वक्त ही जीत की तबीयत खराब थी और उसकी पत्नी नौ महीने की गर्भवती थी. परिवार ने यह बात पुलिस को साफ साफ बताई थी. इसके बावजूद आरोप है कि पुलिस ने न तो उसकी सेहत को गंभीरता से लिया और न ही मानवीय संवेदनशीलता दिखाई.
लगातार दो दिनों तक थाना में की गई पूछताछ
शिकायत के मुताबिक जीत महतो को लगातार दो दिनों तक थाना में रखकर पूछताछ की गई. इस दौरान परिजनों को उससे मिलने तक नहीं दिया गया. सवाल उठता है कि क्या किसी आरोपी को हिरासत में रखने के दौरान उसकी मेडिकल स्थिति की निगरानी पुलिस की जिम्मेदारी नहीं होती. दो दिनों के भीतर जीत की हालत लगातार बिगड़ती चली गई, लेकिन पुलिस की तरफ से कोई ठोस मेडिकल कदम नहीं उठाया गया.
स्थिति नाजुक हुई तो एमजीएम अस्पताल में कराया भर्ती
जब स्थिति बेहद नाजुक हो गई तब जीत को एमजीएम सरकारी अस्पताल ले जाया गया. इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. परिजनों के अनुसार जिस दिन जीत की सांसें थमीं उसी दिन उसकी पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया. एक तरफ नई जिंदगी ने इस दुनिया में कदम रखा और दूसरी तरफ उसी दिन पिता की मौत ने परिवार को तोड़ कर रख दिया. यह महज एक मौत नहीं, बल्कि एक पूरे परिवार के भविष्य पर लगा गहरा घाव है.
पीड़ित परिवार को दो लाख रुपये जाना कई सवाल खड़ा करता है
मौत के बाद पुलिस द्वारा पीड़ित परिवार को दो लाख रुपये दिए जाने का मामला भी कई सवाल खड़े करता है. परिजनों का कहना है कि उन्हें यह तक नहीं बताया गया कि यह राशि किस मद में दी गई और इसका स्रोत क्या है. क्या यह मुआवजा था या किसी तरह की तात्कालिक मदद. अगर मुआवजा था तो किस नियम के तहत, और अगर नहीं था तो यह पैसा क्यों और किस अधिकार से दिया गया.
पुलिस प्रशासन की सफाई भी सवालों के घेरे में
इस पूरे मामले में पुलिस प्रशासन की सफाई भी सवालों के घेरे में है. जमशेदपुर के एसपी का कहना है कि जीत महतो को अस्पताल ले जाने से पहले पीआर बांड पर रिहा कर दिया गया था और मानवीय आधार पर पुलिस वाहन से अस्पताल पहुंचाया गया. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर पीआर बांड पर रिहाई हो चुकी थी तो फिर मौत से पहले तक उसकी जिम्मेदारी किसकी थी. हिरासत के दौरान बिगड़ी तबीयत की जवाबदेही कौन लेगा?
राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों में भारी आक्रोश
मानवाधिकार कार्यकर्ता मनोज मिश्रा ने एनएचआरसी को बताया है कि इस घटना को लेकर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों में भारी आक्रोश है. उन्होंने आयोग से उच्चस्तरीय जांच कराने पीड़ित परिवार को उचित सरकारी मुआवजा दिलाने दोषी पुलिसकर्मियों पर सख्त कार्रवाई करने और सभी थानों में थर्ड डिग्री पर रोक लगाने के लिए सीसीटीवी कैमरे अनिवार्य करने की मांग की है.
पुलिस हिरासत में मानवाधिकारों की स्थिति पर बड़ा सवाल
यह मामला सिर्फ जीत महतो की मौत का नहीं है, बल्कि यह पुलिस हिरासत में मानवाधिकारों की स्थिति पर बड़ा सवाल खड़ा करता है. क्या बीमारी की हालत में किसी युवक को दो दिन तक थाना में रखना जायज था. क्या परिजनों को मिलने से रोकना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है. अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक था तो फिर मौत क्यों हुई? और अगर नहीं था तो जिम्मेदार कौन है? एनएचआरसी की जांच अब यह तय करेगी कि यह मौत प्राकृतिक थी या सिस्टम की लापरवाही का नतीजा. सवाल प्रशासन से है और जवाब भी उसी को देना होगा.