Bihar Elections: बिहार में पिछले 20 साल से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार का कब्जा केवल संयोग नहीं है. चाहे बीजेपी हो या आरजेडी, कम विधायक होने के बावजूद भी दोनों पार्टियां उन्हें सीएम की कुर्सी देने को तैयार रही हैं. राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी नीतीश कुमार ने बिहार में ईबीसी वोटर्स और महिला वोटर्स का बड़ा राजनीतिक बैंक तैयार कर रखा है, जिसे दिल्ली में बैठे लोग बिना बिहार में पहुंचे समझ नहीं सकते. शायद यही कारण है कि देश के गृहमंत्री अमित शाह शुक्रवार को नीतीश कुमार से मिलने पटना उनके घर पहुंचे, ताकि मिडिया में दिए गए बयान के चलते उत्पन्न हो रही अटकलों को विराम दिया जा सके.
एनडीए का सीट बंटवारा स्पष्ट करता है कि जनता दल यूनाइटेड को इग्नोर करना नामुमकिन है. 243 सीटों में बीजेपी और जेडीयू को समान रूप से 101-101 सीटें मिली हैं. लोजपा को 29 सीटें और HAM-RLM को 6-6 सीटें मिली हैं. विपक्ष का आरोप है कि नीतीश कुमार को किनारे करने के लिए लोजपा को जानबूझकर अधिक सीट दी गई. पर 2020 के अनुभव के आधार पर यह स्पष्ट है कि बीजेपी ने नीतीश कुमार को सीएम बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी. महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के उदाहरण बताते हैं कि अन्य राज्यों में बीजेपी ने अपने गठबंधन सहयोगियों के लिए ऐसा कठोर रुख अपनाया, पर बिहार में स्थिति अलग है क्योंकि नीतीश कुमार के पास चुनाव परिणाम के बाद महागठबंधन की ओर जाने का विकल्प मौजूद है, जिससे बीजेपी को कोई जोखिम नहीं उठाना पड़ता.
नीतीश कुमार की बिहार में लोकप्रियता से कोई इनकार नहीं कर सकता है. महिला वोटर्स और ईबीसी उनका मजबूत आधार हैं. हालांकि राजनीति में लोकप्रियता हमेशा निर्णायक नहीं होती, लेकिन बिहार में नीतीश की स्थिति अनोखी है. मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि लोकप्रिय मुख्यमंत्री होने के बावजूद भी बीजेपी ने गठबंधन प्रबंधन के तहत बदलाव किए. बिहार में ऐसा करने का जोखिम बहुत अधिक है क्योंकि नीतीश के पास अन्य विकल्प हैं और बीजेपी यह अच्छी तरह समझती है.
अमित शाह ने मिडिया में कहा था कि एनडीए नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ रहा है और जीत के बाद सभी सहयोगी मिलकर निर्णय लेंगे. उन्होंने नीतीश की स्वास्थ्य और राजनीतिक पलटी को लेकर अफवाहों को भी खारिज किया. शाह ने नीतीश के राजनीतिक अनुभव और संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि बिहार ने उनके नेतृत्व में विकास के क्षेत्र में प्रगति की है. जेडीयू ने इसे गठबंधन सम्मान का प्रतीक माना, जबकि विपक्ष ने इसे बीजेपी की मजबूरी करार दिया.
नीतीश कुमार बिहार में ऐसी स्थिति में हैं कि उन्हें चुनाव परिणाम के बाद भी नजरअंदाज करना बीजेपी के लिए न केवल मुश्किल, बल्कि जोखिमपूर्ण है. उनके मजबूत वोट बैंक और महागठबंधन में विकल्प होने की वजह से बीजेपी के पास कोई प्लान-बी नहीं है. अमित शाह का व्यक्तिगत दौरा और बयान गठबंधन को मजबूत करने और विपक्षी अटकलों को नियंत्रित करने की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है. यह साफ संकेत है कि नीतीश कुमार की राजनीतिक मजबूती बिहार के चुनावी समीकरणों में निर्णायक भूमिका निभाएगी और उन्हें सीएम की कुर्सी से हटाना फिलहाल बीजेपी के लिए व्यावहारिक नहीं है.