Jharkhand: झारखंड में जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय समुदायों के अधिकार को मजबूत करने के लिए पेसा कानून तो लागू कर दिया गया, लेकिन इसके क्रियान्वयन में स्पष्टता की कमी अब विकास की राह में बाधा बनने लगी है। राज्य में बालू और पत्थर की आपूर्ति बीते कई वर्षों से नीतिगत असमंजस और प्रशासनिक उलझनों की भेंट चढ़ी हुई है, जिससे आम जनता से लेकर छोटे कारोबारी तक त्रस्त हैं।
ग्राम सभा और प्रशासन के बीच समन्वय का अभाव
PESA कानून का मूल उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा को प्राकृतिक संसाधनों पर निर्णय लेने का अधिकार देना है। हालांकि, धरातल पर ग्राम सभा की अनुमति, पर्यावरण क्लीयरेंस और खनन पट्टों के बीच तालमेल नहीं बैठ पा रहा है। स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव में वैध खनन ठप पड़ा है, जिसका सीधा फायदा अवैध खनन माफिया उठा रहे हैं।
छोटे कारोबारियों की टूटी कमर
इस संकट की सबसे बड़ी मार छोटे कारोबारियों पर पड़ी है। हजारों स्थानीय व्यवसायी, ट्रांसपोर्टर और मजदूर बालू घाटों और क्रशर उद्योग से जुड़े हैं। पट्टों की नीलामी न होने से उनका काम बंद है। स्थानीय उद्यमियों का कहना है कि, बड़े ठेकेदार अपना रास्ता निकाल लेते हैं, लेकिन छोटे व्यापारियों के लिए प्रक्रिया जटिल है। महीनों से कामकाज बंद होने के कारण ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी बढ़ रही है।
आम जनता पर बढ़ता बोझ
निर्माण सामग्री की कमी ने आम आदमी के आशियाने के सपने को महंगा कर दिया है। बालू और पत्थर के दाम आसमान छू रहे हैं, जिससे घर बनाना अब बजट से बाहर हो रहा है। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी महत्वपूर्ण योजनाएं सामग्री की कमी के कारण धीमी पड़ गई हैं। लोग मजबूरी में अवैध रूप से बेची जा रही महंगी सामग्री खरीदने को विवश हैं।
समाधान की राह, विशेषज्ञ राय
जानकारों का मानना है कि सरकार को PESA के सम्मान के साथ-साथ व्यावहारिक समाधान निकालने होंगे। इसके लिए ग्राम सभाओं को प्रशिक्षित करना, खनन की सीमा तय करना और छोटे कारोबारियों के लिए लाइसेंस प्रक्रिया को सरल व पारदर्शी बनाना अनिवार्य है।
झारखंड के लिए यह केवल खनन का मुद्दा नहीं, बल्कि राज्य के राजस्व और लाखों लोगों के रोजगार का सवाल है। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह कब तक नीतिगत स्पष्टता लाकर इस डेडलॉक को तोड़ती है।