Jharkhand Foundation Day: देश की आम जनता को कभी भाषा, कभी जाति तो कभी धर्म के सवालों में उलझा दिया जाता है, लेकिन यह बड़ा सच अक्सर दबा दिया जाता है कि देश को मजबूत रखने के लिए राज्यों के बीच समन्वय और संसाधनों का आदान-प्रदान सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है. इसी कड़ी में झारखंड एक ऐसा राज्य है जो खुद को पिछड़ा कहे जाने की नैरेटिव के बावजूद पूरे देश को ऊर्जा से लेकर उद्योगों तक लगातार सहारा देता है. झारखंड का खनिज सिर्फ राज्य की जरूरत नहीं बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की धुरी है.
झारखंड का कोयला कई बिजली घरों की रीढ़
झारखंड कोयला (देश के 27.3% भंडार), लौह अयस्क (26% भंडार), अभ्रक, बॉक्साइट, चूना पत्थर, तांबा (18.5% भंडार) और यूरेनियम जैसे खनिजों का प्रमुख स्रोत है. राज्य में वित्तीय वर्ष 2023 में कुल खनिज उत्पादन 138.15 मिलियन टन रहा, जो लगभग 160 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन का हिस्सा है और मूल्य के लिहाज से 75,358 करोड़ रुपये के आसपास है. झरिया और बोकारो जैसे कोयला क्षेत्र न सिर्फ झारखंड बल्कि देश भर के बिजलीघरों और इस्पात कारखानों की रीढ़ हैं, जहां 2022-23 में राज्य ने 156.5 मिलियन टन कोयला उत्पादित किया, जो भारत के कुल उत्पादन का 17.5% है. जमशेदपुर और बोकारो में इस्पात उत्पादन सिर्फ झारखंड की अर्थव्यवस्था को नहीं बल्कि देश के बुनियादी ढांचे को आकार देता है.
दिल्ली सहित उत्तर भारत के कई बिजलीघर झारखंड के कोयले पर निर्भर हैं. दादरी (एनटीपीसी दादरी, जो पिपरवार खदानों से कोयला प्राप्त करता है) और बरौनी (बिहार में 720 मेगावाट का थर्मल प्लांट) जैसे बड़े थर्मल प्लांट झारखंड से लगातार कोयला प्राप्त करते हैं. इससे उत्तर भारत की बिजली जरूरतें पूरी होती हैं. इसी तरह राजस्थान और पंजाब के कई पावर स्टेशन दूर होते हुए भी झारखंड के कोयले के भरोसे चलते हैं. झारखंड का खनिज देश की औद्योगिक उत्पादन श्रृंखला में एक अनिवार्य हिस्सा है.
यूरेनियम की आपूर्ति में भी झारखंड की भूमिका अहम
लोहे की बात करें तो लौह अयस्क का बड़ा हिस्सा झारखंड और ओडिशा से निकलता है और पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु तक भेजा जाता है. 2022-23 में झारखंड ने लगभग 33-35 मिलियन टन लौह अयस्क उत्पादित किया, जो भारत के कुल 280 मिलियन टन उत्पादन का 12-13% है. देश का इस्पात उद्योग झारखंड पर भारी निर्भरता रखता है. तांबे का उत्पादन राज्य पर काफी हद तक निर्भर करता है और इसका सीधा उपयोग बिजली, इलेक्ट्रॉनिक्स और निर्माण क्षेत्र में होता है. वहीं यूरेनियम की आपूर्ति में भी झारखंड की भूमिका अहम है, जिससे देश के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को गति मिलती है.
बॉक्साइट से बनने वाला एल्यूमीनियम महाराष्ट्र, गुजरात और ओडिशा की रिफाइनरियों में जाता है. अभ्रक का निर्यात दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे बाजारों तक होता है. यानी यह कहना गलत नहीं कि दिल्ली की इमारतों से लेकर देश की बिजली, उद्योग और सड़क परियोजनाओं तक झारखंड की खदानों की छाप साफ देखी जा सकती है.
आर्थिक मोर्चे पर भी लगातार आगे बढ़ रहा राज्य
राज्य आर्थिक मोर्चे पर भी लगातार आगे बढ़ रहा है. खनन से मिलने वाली रॉयल्टी और राजस्व ने झारखंड की वित्तीय स्थिति को पहले से मजबूत बनाया है, जहां वित्तीय वर्ष 2025 में रॉयल्टी से 19,300 करोड़ रुपये की आय की उम्मीद है. बड़े औद्योगिक निवेशों ने रोजगार पैदा किया है और बुनियादी ढांचा तेजी से विकसित हुआ है. बोकारो में मेगा स्टील परियोजनाएं, देवघर और दुमका में उद्योग आधारित कॉरिडोर, जमशेदपुर में ऑटोमोबाइल सेक्टर का विस्तार और गोड्डा में पावर प्लांट जैसे कदम झारखंड को उद्योग मानचित्र पर और मजबूती से खड़ा कर रहे हैं. राज्य की जीएसडीपी 2024-25 में 4,70,104 करोड़ रुपये अनुमानित है, जो 9.8% की वृद्धि दर्शाती है, जबकि 2025-26 में यह 5,56,286 करोड़ रुपये पहुंचने की संभावना है (7.5% वृद्धि). पिछले तीन वर्षों में अर्थव्यवस्था 7.7% की स्थिर वृद्धि दर्ज कर चुकी है.
राज्य सरकार खनन पर निर्भरता घटाकर सर्विस सेक्टर और कृषि आधारित उद्योगों को भी बढ़ावा दे रही है. सड़क, रेलवे और एयरपोर्ट कनेक्टिविटी में सुधार ने व्यापार को नया आधार दिया है. रांची और जमशेदपुर धीरे-धीरे देश के उभरते कारोबारी केंद्रों में शामिल हो रहे हैं.
झारखंड को अक्सर पिछड़ेपन के चश्मे से देखा जाता है, लेकिन जमीन पर इसकी भूमिका कहीं अधिक व्यापक है. यह राज्य सिर्फ अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो रहा बल्कि पूरे देश को ऊर्जा और औद्योगिक शक्ति दे रहा है. राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की असली धुरी वही राज्य हैं जो संसाधनों से देश को सहारा देते हैं और झारखंड उसी श्रेणी में मजबूती से खड़ा है. चुनौती सिर्फ राजनीति द्वारा बनाए गए नकारात्मक नैरेटिव की है, जबकि हकीकत यह है कि भारत की वृद्धि में झारखंड की खदानें और उद्योग महत्वपूर्ण साझेदारी निभा रहे हैं.