Big News: झारखंड के औद्योगिक नगरी जमशेदपुर में हाल ही में हुई फायरिंग घटना ने न सिर्फ स्थानीय कारोबारियों में दहशत फैलाई है. बल्कि पूरे राज्य में माफिया नेटवर्क की घुसपैठ को उजागर कर दिया है. 10 अक्टूबर 2025 को सीतारामडेरा थाना क्षेत्र के भुइयाडीह में व्यापारी हरेराम सिंह के घर पर तीन शूटरों ने अंधाधुंध फायरिंग की. यह घटना किसी साधारण आपराधिक वारदात से कहीं आगे की साजिश थी, जो दुबई से संचालित हो रही थी.
पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए तीनों शूटरों गोपाल उर्फ रवि महानंद, राजेश और एक अन्य को गिरफ्तार कर लिया है. शूटरों के कब्जे से तीन पिस्तौलें, इस्तेमाल की गई स्कूटी और अन्य सामान बरामद हो चुका है. महानंद को छठ की रात सिदगोड़ा में मुठभेड़ के दौरान पांव में गोली लगी. जबकि उसके साथी बाद में पकड़े गए. लेकिन यह सिर्फ सतह का खुलासा है. जांच में सामने आया कि साजिश के सूत्रधार पूर्वी सिंहभूम के भाजपा कार्यकर्ता दशरथ शुक्ला, काशीडीह का कोण्डू और गाराबासा का गोपाल हैं. जो धनबाद के कुख्यात गिरोहों से जुड़े हैं. दशरथ को रांची के बुंडू थाना क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया. उसके पास से चार लोडेड पिस्तौलें, मैगजीन, दो मोबाइल फोन और काला बैग बरामद हुआ. पूछताछ में उसने कबूल किया कि वह सुजीत सिन्हा गिरोह के सदस्यों को हथियार सप्लाई करने आया था. उसके मोबाइल से प्रिंस खान और सुजीत सिन्हा जैसे अपराधियों के संपर्क विवरण मिले, जो साफ बताते हैं कि यह रंगदारी का सिलसिला स्थानीय स्तर पर ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बुना गया है. दशरथ का अपराधिक इतिहास लंबा है. हत्या के प्रयास, आर्म्स एक्ट, एससी एसटी एक्ट, जुआ और संपत्ति क्षति जैसे दर्जनों मामले उसके नाम हैं. रांची पुलिस ने उसे जेल भेज दिया है. लेकिन असली सवाल यह है कि दुबई में छिपे प्रिंस खान और झारखंड की जेल में बंद सुजीत सिन्हा जैसे मास्टरमाइंड को कैसे काबू किया जाए.
यह केस झारखंड में बढ़ते माफिया अपराधों का आईना है. जहां रांची, धनबाद और जमशेदपुर जैसे शहरों में रंगदारी, फायरिंग और हत्या की धमकियां आम हो चुकी हैं. प्रिंस खान, वासेपुर का कुख्यात गैंगस्टर 2021 से दुबई में छिपा हुआ है. जहां से वह अपने नेटवर्क को चला रहा है. उसका पासपोर्ट रद्द हो चुका है. फिर भी वह पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए हथियार मंगवाकर झारखंड के कारोबारियों को लूट रहा है. सुजीत सिन्हा, कोयलांचल शांति सेना (केएसएस) का सरगना. फिलहाल हजारीबाग जेल में सजा काट रहा है. लेकिन जेल की दीवारें उसके साम्राज्य को रोक नहीं पा रही. हाल ही में रांची में उसके गिरोह की पत्नी रिया सिन्हा सहित पांच सदस्यों को गिरफ्तार किया गया. जिनके पास पाकिस्तान निर्मित तीन पिस्तौलें और गोलीबारी का सामान मिला. पलामू में उसके छह सहयोगियों को हाईवे प्रोजेक्ट्स पर हमले और जेल फायरिंग के आरोप में पकड़ा गया. ये गिरोह न सिर्फ स्थानीय व्यापारियों को निशाना बना रहे हैं. बल्कि डॉक्टरों और राजनेताओं तक को धमकी दे रहे हैं.
जमशेदपुर एसपी कुमार शिवाशीष के मुताबिक हरेराम सिंह के बेटे हरिश सिंह ने पहले दशरथ शुक्ला को शराब के कारोबार में साझेदारी का लालच दिया था. लेकिन लाइसेंस मिलने के बाद उन्होंने किसी अन्य से साझा लिया. इससे नाराज दशरथ ने प्रिंस खान और सुजीत सिन्हा के गिरोह से मदद ली. जिसके चलते 2 करोड़ रुपये की रंगदारी की मांग हुई. पुलिस ने अब तक 12 सहयोगियों को गिरफ्तार किया है. लेकिन नेटवर्क की जड़ें गहरी हैं. पाकिस्तान से हथियार, दुबई से निर्देश और स्थानीय स्तर पर शूटर.
विदेश में ऑपरेट हो रहे भारतीय अपराधियों की यह प्रवृत्ति कोई नई नहीं है. दुबई, शारजाह और अबू धाबी जैसे यूएई के शहर लंबे समय से भारतीय माफिया के सुरक्षित ठिकाने बने हुए हैं. प्रिंस खान की तरह ही नीरव मोदी, मेहुल चोकसी और अगस्तावेस्टलैंड घोटाले के आरोपी राजीव सक्सेना जैसे फरार अपराधी वहां छिपे रहते हैं. लेकिन अच्छी खबर यह है कि भारत यूएई संबंधों में मजबूती के चलते प्रत्यर्पण के मामले तेज हो गए हैं. 2019 से अब तक यूएई ने कम से कम चार हाई प्रोफाइल प्रत्यर्पण किए हैं. जैसे कि डी कंपनी के सदस्यों को, सितंबर 2025 में पंजाब के एक उग्रवादी परमिंदर सिंह उर्फ पिंडी को अबू धाबी से प्रत्यर्पित किया गया. जहां सीबीआई और इंटरपोल की रेड कॉर्नर नोटिस काम आई. यह दिखाता है कि यूएई अब भारत के साथ सहयोग करने को तैयार है. खासकर जब अपराध गंभीर हों. लेकिन देरी की मुख्य वजहें हैं, कानूनी प्रक्रिया की लंबी जिरह, अपराधी की अपीलें और कभी कभी डिप्लोमेटिक दबाव. प्रिंस खान का मामला इसी का उदाहरण है. झारखंड सरकार ने अक्टूबर 2023 में केंद्र को प्रत्यर्पण का अनुरोध भेजा. इंटरपोल ने रेड नोटिस जारी की. लेकिन दो साल बाद भी प्रक्रिया अधर में लटकी है. जमशेदपुर विधायक सरयू रॉय ने हाल ही में सीएम हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर केंद्र पर दबाव बनाने की मांग की. क्योंकि प्रिंस का आतंक अब रांची, बोकारो तक फैल चुका है.
भारत और यूएई के बीच प्रत्यर्पण के नियम 2000 में हस्ताक्षरित संधि पर आधारित हैं. जो 2012 से प्रभावी है. यह संधि भारत के प्रत्यर्पण अधिनियम 1962 और यूएई के संघीय कानूनों से बंधी है. मुख्य शर्त दोहरी आपराधिकता है. अपराध दोनों देशों में कम से कम एक साल की सजा का हो. रंगदारी, हत्या के प्रयास या आर्म्स एक्ट जैसे अपराध कवर होते हैं. लेकिन कर चोरी जैसे सिविल मामले नहीं. प्रक्रिया शुरू होती है भारत सरकार (विदेश मंत्रालय या सीबीआई) के औपचारिक अनुरोध से. जिसमें आरोपी का विवरण, अपराध का प्रमाण और गिरफ्तारी वारंट शामिल होता है. इंटरपोल रेड नोटिस के जरिए यूएई को अलर्ट किया जाता है. यूएई में अभियोजक दस्तावेज जांचता है. फिर अपील कोर्ट (तीन जजों की बेंच) सुनवाई करती है. आरोपी बचाव कर सकता है, जैसे राजनीतिक अपराध होने का दावा, 30 दिनों में कैसेशन कोर्ट में अपील और अंत में यूएई के न्याय मंत्री फैसला लेते हैं. मंजूरी मिलने पर आरोपी भारत सौंपा जाता है. लेकिन अगर वहां कोई अन्य केस हो तो देरी हो सकती है. इंकार के आधार राजनीतिक अपराध, यूएई नागरिकता (प्रिंस भारतीय है, तो लागू नहीं). यातना का डर (भारत आश्वासन दे सकता है). साक्ष्य की कमी या सीमावधि समाप्ति, एकाधिक अनुरोधों में प्राथमिकता राष्ट्रीय सुरक्षा या अपराध स्थल को मिलती है. 2011 की कैदी हस्तांतरण संधि जेल में सजा काट रहे कैदियों को लाने की अनुमति देती है. लेकिन हत्या या ड्रग्स केसों में नहीं. भारत पहुंचने पर मजिस्ट्रेट के सामने पेशी और ट्रायल होती है. हालिया उदाहरणों से साफ है कि अगर साक्ष्य मजबूत हों, तो सफलता मिलती है. जैसे परमिंदर सिंह का केस.
प्रिंस खान पर नकेल कसने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे. सबसे पहले, झारखंड पुलिस को केंद्र के सीपीवी डिवीजन (क्रिमिनल्स परसेक्यूशन एंड व्हाइट कॉलर क्राइम) से समन्वय बढ़ाना चाहिए. इंटरपोल रेड नोटिस पहले से है. अब डिप्लोमेटिक चैनलों से यूएई पर दबाव डालें. जैसे सीएम हेमंत सोरेन, गृह मंत्री अमित शाह से मिलें, साक्ष्य मजबूत करें. हरेराम फायरिंग के कॉल रिकॉर्ड, वीडियो और शूटरों के बयान जोड़ें. पासपोर्ट रद्द होने से वह दुबई में फंस चुका है. यूएई पुलिस उसे पकड़ सकती है. अगर प्रत्यर्पण में देरी हो तो यूएई में ही मुकदमा चलवाने का विकल्प (संधि के तहत) आजमाएं. इसी तरह, सुजीत सिन्हा पर कड़ाई के लिए जेल से बाहर उसके नेटवर्क को तोड़ना जरूरी है. वह हजारीबाग जेल में है, लेकिन पत्नी रिया और सहयोगी बाहर सक्रिय हैं. हालिया गिरफ्तारियों से साबित है कि इंटरोगेशन से नए लिंक मिल रहे हैं. पाकिस्तान हथियार रूट को एटीएस और एनआईए सौंपें. जेल में सोलिटरी कंफाइनमेंट बढ़ाएं. वीडियो कॉल और वकीलों पर निगरानी रखें. रांची एसपी परस राणा के अनुसार, सुजीत के गिरोह का प्रिंस से सीधा कनेक्शन है. इसलिए दोनों केसों को जोड़कर चार्जशीट फाइल करें.
पूरे नेटवर्क को खत्म करने के लिए अकेली पुलिस काफी नहीं. सरकारी, न्यायिक और सामाजिक तंत्र को एकजुट होना पड़ेगा. बिहार के पूर्व सीएम बिंदेश्वरी दूबे के माफिया उन्मूलन अभियान की तरह ऑपरेशन क्लीन स्वीप चलाएं. स्पेशल टास्क फोर्स गठित करें, जिसमें डीजीपी, मुख्य सचिव और केंद्र के गृह मंत्रालय शामिल हों. कारोबारियों को हेल्पलाइन दें, एक्सटॉर्शन कॉल्स पर तुरंत एक्शन लें. सामाजिक जागरूकता से सूचनाएं बढ़ेंगी. जैसे एनजीओ और मीडिया के साथ कैंपेन, अगर केंद्र राज्य मिलकर काम करें तो प्रिंस जैसे दुबई के डॉन भी लौटेंगे, और सुजीत का साम्राज्य जेल की चारदीवारी में सिमट जाएगा. अन्यथा, कारोबारियों की जिंदगी खतरे में पड़ी रहेगी और माफिया रक्तबीज की तरह पनपते रहेंगे. पुलिस का प्रयास सराहनीय है लेकिन अब दुर्गा की शक्ति दिखाने का वक्त है. न्याय जल्द और सख्त हो.