Indian Railway: रेलवे के 12 हजार छठ स्पेशल ट्रेनों के दावे धराशायी हो गए हैं. दिल्ली से पटना के बीच चल रहीं केवल 19 ट्रेनें ही यात्रियों के बोझ से हांफ रही हैं. हालात ऐसे हैं कि किसी भी ट्रेन में पांव रखने तक की जगह नहीं बची है. देशभर में छठ महापर्व की तैयारियां जोरों पर हैं, लेकिन घर लौटने की कोशिश में लगे लोगों की उम्मीदें रेलवे की घोषणाओं के नीचे दब गई हैं.
कुछ दिनों पहले रेल मंत्री ने छठ पर्व पर 12 हजार स्पेशल ट्रेनें चलाने का दावा किया था. बिहार और पूर्वी भारत के लाखों प्रवासी श्रमिकों को उम्मीद थी कि इस बार सफर आसान रहेगा. लेकिन जैसे-जैसे तारीखें नजदीक आ रही हैं, वैसा कुछ होता नहीं दिख रहा. दिल्ली से पटना के बीच चलने वाली ट्रेनों में छह दिन पहले तक कोई सीट खाली नहीं है. स्थिति यह है कि 26 अक्टूबर तक सभी ट्रेनें फुल हैं और वेटिंग लिस्ट भी खचाखच भर चुकी है.
यात्रियों का कहना है कि दिल्ली से पटना, दरभंगा, भागलपुर, सहरसा और मुजफ्फरपुर जाने वाली ज्यादातर ट्रेनों में अब “नो रूम” दिखा रहा है. कई लोगों ने टिकट के लिए तत्काल और प्रीमियम तत्काल में भी कोशिश की, लेकिन वहां भी सिर्फ “वेटिंग 300 प्लस” का संदेश मिला. रेलवे के मुताबिक, दिल्ली से पटना रूट पर सिर्फ 19 ट्रेनें स्पेशल के रूप में चल रही हैं. यह संख्या उस घोषणा के बिल्कुल उलट है जिसमें 12 हजार ट्रेनों का दावा किया गया था.
पटना जंक्शन पर भीड़ का आलम अलग ही है. प्लेटफॉर्मों पर यात्रियों की भीड़ और अफरातफरी से हालात बिगड़ रहे हैं. न तो यात्रियों के इंतजार के लिए कोई होल्डिंग एरिया बनाया गया है और न ही सुरक्षा या भीड़ नियंत्रण की कोई ठोस व्यवस्था की गई है. रेलवे प्रशासन की तैयारी केवल कागजों में दिख रही है. यात्रियों के मुताबिक, स्टेशन के अंदर भीड़ इतनी है कि सांस लेना मुश्किल हो रहा है.
वंदे भारत स्पेशल ट्रेन, जिसे छठ के दौरान सबसे तेज और आरामदायक विकल्प बताया गया था, उसकी सीटें भी कई दिनों पहले फुल हो चुकी हैं. दिल्ली से पटना वंदे भारत में भी अब टिकट मिलना नामुमकिन हो गया है. यात्रियों को मजबूरन बसों और निजी वाहनों का सहारा लेना पड़ रहा है, जिनमें किराया तीन से चार गुना तक बढ़ गया है.
रेलवे के आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा फासला दिख रहा है. जहां कागजों पर 12 हजार स्पेशल ट्रेनें चल रही हैं, वहीं जमीन पर मुश्किल से कुछ सौ ट्रेनें ही दिखाई दे रही हैं. सबसे ज्यादा परेशानी प्रवासी मजदूरों, विद्यार्थियों और परिवारों को हो रही है जो पूरे साल काम करने के बाद अपने गांव लौटना चाहते हैं.
रेलवे की तैयारी एक बार फिर से चुनावी घोषणाओं की तरह साबित हुई है, बड़ी बातें, छोटे नतीजे. बारह हजार स्पेशल ट्रेनों का दावा जमीनी स्तर पर पूरी तरह असफल रहा है. यह न केवल रेलवे की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गहरी चोट करता है. छठ महापर्व बिहार और पूर्वी भारत के लिए भावनाओं का पर्व है, लेकिन लाखों लोगों के लिए यह अब संघर्ष का पर्व बन गया है. जिस सिस्टम से सुविधा की उम्मीद थी, वही अब परेशानी का कारण बन गया है. रेलवे को चाहिए कि वह सिर्फ घोषणाएं करने के बजाय वास्तविक जरूरतों और यात्रियों की क्षमता के अनुसार योजनाएं बनाए, नहीं तो ऐसे मौके हर साल यात्रियों के लिए दुःस्वप्न बनते रहेंगे.