एनएचआरसीसीबी के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव विनय कुमार चंद्रा ने जानकारी दी कि शिकायत सीपीग्राम्स (Ref: DOWCD/E/2025/0004245) और एनएचआरसीसीबी (Ref: NHRCCB7184 दिनांक 12.09.2025) के जरिए दर्ज की गई थी। लेकिन इस शिकायत को झारखंड के बजाय पश्चिम बंगाल और प्रयागराज जैसे असंबंधित राज्यों को भेज दिया गया और अंततः बिना किसी ठोस कार्रवाई के बंद कर दिया गया।
उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर झारखंड की महिला सुरक्षा शिकायत को अन्य राज्यों को क्यों भेजा गया? शिकायत को बंद करने के पीछे कौन से कारण और फाइल नोटिंग्स हैं? पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त-सह-जिलाधिकारी का आदेश दिनांक 09.09.2022, जिसमें पीड़िता के संपत्ति अधिकारों की रक्षा की बात कही गई थी, उसे लागू क्यों नहीं कराया गया? और स्थानीय पुलिस को एफआईआर दर्ज करने व सुरक्षा प्रदान करने से क्यों रोका गया?
चंद्रा ने इस मामले में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6(1) के तहत एनसीडब्ल्यू से पूरी जानकारी मांगते हुए एक आरटीआई दायर की है। उन्होंने कहा कि धारा 4(1)(d) के तहत हर प्रशासनिक निर्णय का कारण बताना अनिवार्य है। साथ ही, CIC बनाम भगत सिंह (2007) के अनुसार बिना कारण बताए सूचना से इनकार करना अवैध है। सुप्रीम कोर्ट के ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2014) फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने याद दिलाया कि संज्ञेय अपराधों में एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है।
अपने बयान में विनय कुमार चंद्रा ने कहा, “यह मामला सिर्फ़ एक महिला के घर और जान की सुरक्षा का नहीं है, बल्कि हमारे संस्थानों की विश्वसनीयता का सवाल है। पीड़िता को सुरक्षा देने की बजाय उसकी शिकायत को इधर-उधर घुमाकर बंद कर दिया गया। मैं तब तक लड़ाई लड़ूंगा जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होती, पीड़िताओं को सुरक्षा नहीं मिलती और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होती।”
एनएचआरसीसीबी और विनय कुमार चंद्रा ने इस मामले में कई अहम मांगें रखी हैं। इनमें एनसीडब्ल्यू की फाइल नोटिंग्स, अनुमोदन और पत्राचार सार्वजनिक करना, गलत तरीके से शिकायत को आगे बढ़ाने और बंद करने वाले अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई, पीड़ित महिलाओं को तत्काल पुलिस सुरक्षा और उपायुक्त के आदेश को सख्ती से लागू करना शामिल है।
यह मामला अब महिला सुरक्षा से जुड़े संस्थानों और स्थानीय पुलिस की जवाबदेही की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।