जानकारी के अनुसार
जानकारी के अनुसार, जन्म के बाद ही बच्चे को इंटुबेट करना पड़ा और टोटल पेरेंट्रल न्यूट्रिशन शुरू किया गया। इलाज के दौरान दो खुराक सर्फैक्टेंट दी गईं और रक्त घटकों की आवश्यकता भी पड़ी। स्थिति इतनी गंभीर थी कि बच्चे को पल्मोनरी हाइपरटेंशन और न्यूमोथोरैक्स की समस्या का सामना करना पड़ा। पाँचवें और सातवें दिन दोनों ओर आईसीडी डालनी पड़ी। आठवें दिन एक्सट्यूबेशन का प्रयास विफल रहा और तीसरी आईसीडी डालनी पड़ी। यह समय डॉक्टरों और परिवार के लिए बेहद कठिन रहा, क्योंकि एक ओर वेंटिलेटर सपोर्ट ज़रूरी था और दूसरी ओर फेफड़ों से हवा का रिसाव हो रहा था।
चुनौतियों के बावजूद
चुनौतियों के बावजूद, बच्चे ने हार नहीं मानी और धीरे-धीरे स्वास्थ्य लाभ करते हुए स्थिति पर विजय प्राप्त की। 26वें दिन जब यह नन्हा योद्धा अपने माता-पिता के साथ डिस्चार्ज हुआ, तो पूरा अस्पताल जश्न के माहौल में था। यह केवल एक चिकित्सा सफलता नहीं, बल्कि विश्वास, टीमवर्क और संघर्ष का जीवंत उदाहरण बन गया।
इस उपलब्धि का श्रेय
इस उपलब्धि का श्रेय डॉ. किशोर गांधी और उनकी टीम को जाता है, जिन्होंने दिन-रात मेहनत कर यह सफलता हासिल की। बच्चे के माता-पिता और परिजनों ने भी पूरे विश्वास के साथ इलाज का साथ दिया। असर्फी हॉस्पिटल प्रबंधन ने इस सफलता को अपनी प्रतिबद्धता का प्रतीक बताया और कहा कि हर शिशु को जीवन की बेहतर शुरुआत देना ही उनका उद्देश्य है।
डॉ. किशोर गांधी ने कहा
डॉ. किशोर गांधी ने कहा कि यह मामला केवल चिकित्सीय चुनौती नहीं, बल्कि जीवन के लिए संघर्ष का प्रतीक था। नन्हें शिशु की जिजीविषा ने पूरी टीम को प्रेरित किया और यह उपलब्धि आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और टीमवर्क का परिणाम है।
घटना से संदेश
यह घटना हम सभी को यही संदेश देती है, लड़ाई कितनी भी कठिन क्यों न हो, जीत संभव है यदि हिम्मत और विश्वास बना रहे।