ग्रामीण बताते हैं कि अवैध बालू खनन और परिवहन के कारण इलाके की सड़कें पूरी तरह जर्जर हो चुकी हैं. स्थिति यह है कि रोगी, विद्यार्थी और आम राहगीरों को आए दिन भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. वहीं सरकार को लाखों-करोड़ों रुपये के राजस्व की भी चपत लग रही है. ग्रामीणों का सवाल है कि जब बालू से सरकार को राजस्व प्राप्त होता है तो फिर सड़कों की मरम्मत क्यों नहीं कराई जा रही है?
खनन विभाग समय-समय पर कार्रवाई भी करता है. अब तक ईचागढ़ थाना क्षेत्र से एक लाख सीएफटी से अधिक अवैध बालू जब्त किया जा चुका है. कई अवैध हाईवा और ट्रैक्टर भी पकड़े गए हैं. विभाग ने तो यहां तक किया कि बाराती बनकर इलाके में पहुंचा और एक ही दिन में लगभग 23 हाईवा पर मामला दर्ज किया. इसके बावजूद बालू कारोबारियों पर अंकुश नहीं लग पाया है.
अधिकारियों की मिलीभगत से लाखों करोड़ो का चल रहा गोरखधंधा
सूत्रों का दावा है कि ईचागढ़ का यह धंधा लाखों-करोड़ों का खेल है, जिसमें आदित्यपुर से जुड़े एक शख्स का नाम अक्सर सामने आता है. बताया जाता है कि उस व्यक्ति की पहचान प्रशासनिक विभाग में मजबूत है और बड़े पैमाने पर पैसों का लेन-देन होता है. यही वजह है कि कार्रवाई ठंडे बस्ते में चली जाती है.
ग्रामीणों का आरोप है कि स्थानीय थाना पर भी कई बार गंभीर सवाल उठे हैं, लेकिन ठोस कदम नहीं उठाए जाते. हालत यह है कि अगर कोई पत्रकार अवैध खनन की तस्वीर खींचने की कोशिश करता है तो कारोबारी उसके साथ बदसलूकी पर उतर आते हैं.
विक्षिप्त को होमगार्ड की वर्दी पहनाकर लगा दिया राज्यपाल की सुरक्षा में, ट्रक की चपेट में आने से गई जान
कुछ समय पहले ईचागढ़ थाना प्रभारी ने एक साधारण व्यक्ति को होमगार्ड की ड्रेस पहनाकर राज्यपाल के कार्यक्रम में ड्यूटी पर तैनात कर दिया था. दुर्भाग्यवश वह व्यक्ति ट्रक की चपेट में आ गया और उसकी मौत हो गई. यह मामला अखबारों और मीडिया में खूब छाया, लेकिन जांच आज तक कागजों से बाहर नहीं निकल पाई. इसे राज्यपाल की सुरक्षा में गंभीर चूक और प्रशासनिक विफलता माना जा रहा है.
जिले के एसपी लगातार अपराध दर घटाने का दावा करते हैं, लेकिन ईचागढ़ का अवैध बालू कारोबार इन दावों की पोल खोल रहा है. हैरानी की बात है कि जिले में माइनिंग ट्रांसपोर्ट को लेकर नियमित बैठकें होती हैं, जिनमें उपायुक्त, एसपी और तमाम वरीय पदाधिकारी शामिल रहते हैं, फिर भी अवैध बालू कारोबार पर लगाम कसना अब तक संभव नहीं हो पाया है.
ईचागढ़ में बालू माफियाओं का बढ़ता दबदबा और प्रशासन की चुप्पी ने ग्रामीणों के सवालों को और गहरा कर दिया है.
ग्रामीणों की उम्मीद पर फिरा पानी
झारखंड में पेसा कानून तो लागू हो नहीं रहा है लेकिन अवैध बालू की ढुलाई पुरे राज्य में धड़ल्ले से जारी है. हेमंत सरकार और उनके अधिकारियों के पास झारखंड के आम जनता को उनका हक और अधिकार दिलाने का कोई विजन नहीं है. हेमंत 1932 के खतियान की बात करते है और खुद उनकी सरकार के अधिकारीगण माफियाओं की मिलीभगत से करोड़ो रुपए के राजस्व की चपत सरकार को लगा रहे है. जिस सरकार को झारखंड की जनता ने अपार बहुमत देकर सत्ता की कुर्सी पर बैठाया है वही सरकार झारखंडी अस्मिता को लुटने में लगी हुई है. हर सुबह जनता एक उम्मीद की निगाह से हेमंत सोरेन सरकार की ओर देखती है लेकिन सरकार को उनकी उम्मीद पर पानी फेरने के आलावा और कुछ नहीं आता है.