6G Network India Partnership: 5G अभी लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन ही रहा है, लेकिन दुनिया अब उससे आगे की तैयारी में जुट गई है. अगली पीढ़ी की मोबाइल तकनीक यानी 6G को लेकर कई देशों ने काम तेज कर दिया है. इसी दौड़ में भारत ने भी एक बड़ा कदम उठाया है. भारत अमेरिका समेत 24 अन्य देशों के साथ 6G तकनीक को लेकर बनी वैश्विक पहल का हिस्सा बन गया है. इस पहल में मिलकर तय किया जाएगा कि आने वाले समय का 6G नेटवर्क कैसा होगा. इसकी तकनीक कितनी सुरक्षित होगी और दुनिया भर में इसके लिए कौन से मानक अपनाए जाएंगे. यानी आने वाले समय में सिर्फ मोबाइल इंटरनेट की स्पीड ही नहीं बदलेगी. 6G के साथ हमारे सफर, काम करने के तरीके और डिजिटल सेवाओं का अनुभव भी बदल सकता है.
25 देश मिलकर तय करेंगे 6G का रास्ता
इस साझेदारी में 25 देश शामिल हैं. सभी देश मिलकर 6G नेटवर्क की दिशा और तकनीकी नियमों पर काम करेंगे. इसका ध्यान सुरक्षित नेटवर्क, बराबरी की प्रतिस्पर्धा और नई तकनीक को बढ़ावा देने पर रहेगा. आने वाले समय में 6G का असर सिर्फ मोबाइल इंटरनेट तक सीमित नहीं रहेगा. स्मार्ट ट्रांसपोर्ट, फैक्ट्रियों, डिजिटल सेवाओं और दूसरे कई क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल बढ़ सकता है.
G20 बैठक में 6G पर हुई बात
मियामी में G20 Innovation Ministerial की बैठक के दौरान भारत के वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक से मुलाकात की. दोनों के बीच 6G के भविष्य को लेकर बातचीत हुई. बैठक में रिसर्च और दोनों देशों के बीच तकनीकी सहयोग पर भी चर्चा हुई. अमेरिकी वाणिज्य विभाग के अनुसार, इस साझी कोशिश से नेटवर्क की सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिलेगी. इसके साथ ही नई तकनीक और बाजार में बराबरी की प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने पर भी जोर रहेगा.
6G सिर्फ तेज इंटरनेट तक सीमित नहीं
6G को केवल 5G से ज्यादा तेज इंटरनेट के तौर पर नहीं देखा जा रहा है. इस तकनीक से इंटरनेट में देरी यानी लेटेंसी को काफी कम करने की उम्मीद है. AI की मदद से चलने वाले संचार सिस्टम को भी इससे बढ़ावा मिल सकता है. इसके अलावा ऑटोमेटेड ट्रांसपोर्ट और स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. भारत पिछले कुछ वर्षों से अपनी टेलीकॉम तकनीक और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर काम कर रहा है. ऐसे में 6G की इस वैश्विक पहल में भारत की भागीदारी को अहम माना जा रहा है. इससे भारत को भविष्य की मोबाइल तकनीक के नियम और मानक तय करने में अपनी बात रखने का मौका मिलेगा.