Mukhyamantri Maiya Samman Yojana: झारखंड सरकार की मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना आज राज्य में सबसे अधिक चर्चा में रहने वाली योजनाओं में से एक है। इसकी शुरुआत 18 अगस्त 2024 को पाकुड़ से वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने की थी। योजना के तहत शुरुआत में पात्र महिलाओं को हर महीने ₹1,000 की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान किया गया, जिसे बाद में बढ़ाकर ₹2,500 प्रति माह कर दिया गया। झारखंड सरकार ने मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना के लिए वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में लगभग ₹14,065.57 करोड़ का प्रावधान किया है. वर्तमान में इस योजना का लाभ लगभग 51 लाख महिलाओं को मिल रहा है।
क्या आर्थिक सहायता ही महिला सशक्तिकरण का रास्ता है?
योजना के तहत प्रत्येक पात्र महिला को हर महीने ₹2,500 की आर्थिक सहायता सीधे डीबीटी (Direct Benefit Transfer) के माध्यम से उनके बैंक खाते में भेजी जाती है। इस तरह एक महिला को सालभर में कुल ₹30,000 की सहायता राशि प्राप्त होती है। सरकार का कहना है कि इस योजना का उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक संबल देना, उनकी रोजमर्रा की जरूरतों में सहयोग करना और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है।
सरकार का कहना है कि झारखंड के ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की महिलाओं के लिए यह राशि घरेलू खर्च, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी आवश्यक जरूरतों को पूरा करने में मददगार साबित हो सकती है। लेकिन इसके साथ ही एक सवाल यह भी उठता है कि क्या केवल आर्थिक सहायता देना ही महिलाओं के सशक्तिकरण का स्थायी समाधान है, या उन्हें रोजगार और आत्मनिर्भरता के अवसर उपलब्ध कराना अधिक जरूरी है?
सहायता नहीं, आत्मनिर्भरता होनी चाहिए लक्ष्य
यदि देश के अन्य राज्यों की बात करें तो महिलाओं को मासिक आर्थिक सहायता देने का मॉडल सबसे पहले बड़े स्तर पर मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना के रूप में सामने आया। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 28 जनवरी 2023 को इस योजना की घोषणा की थी और 5 मार्च 2023 को भोपाल के जंबूरी मैदान से इसका शुभारंभ किया। इस योजना में भी शुरुआत में महिलाओं को ₹1,000 प्रति माह देने का प्रावधान किया गया था। इसके बाद कई राज्यों ने महिलाओं के लिए इसी तरह की प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता वाली योजनाएं शुरू कीं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ पैसा बांटने तक सीमित होनी चाहिए? महिलाओं को आर्थिक सहायता देना निश्चित रूप से एक राहत है, लेकिन असली सशक्तिकरण तब होगा जब महिलाओं के पास अपनी कमाई का साधन होगा। किसी महिला के खाते में हर महीने कुछ हजार रुपये पहुंच जाना अच्छी बात हो सकती है, लेकिन अगर उसके पास रोजगार, कौशल और स्थायी आय का जरिया नहीं है तो वह लंबे समय तक आत्मनिर्भर नहीं बन पाएगी।
जब तक रोजगार नहीं, तब तक सशक्तिकरण अधूरा
झारखंड के 24 जिलों की स्थिति को देखें तो हर जिले में महिलाओं के सामने अलग-अलग चुनौतियां हैं। रांची, जमशेदपुर, बोकारो और धनबाद जैसे औद्योगिक जिलों में भी बड़ी संख्या में ग्रामीण और कमजोर वर्ग की महिलाओं को रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते।
पश्चिमी सिंहभूम, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, साहिबगंज और पाकुड़ जैसे आदिवासी बहुल जिलों में शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय रोजगार की कमी महिलाओं के विकास में बड़ी बाधा है। पलामू, गढ़वा, चतरा, लातेहार और गोड्डा जैसे जिलों में गरीबी और पलायन की समस्या आज भी गंभीर है। कई जिलों में महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं, लेकिन उन्हें सही प्रशिक्षण, बाजार और आर्थिक सहयोग नहीं मिल पाता। अगर सरकार इन महिलाओं को केवल सहायता राशि देने के बजाय उनके उत्पादों को बाजारों में उपलब्ध कराए, छोटे उद्योग लगाने में मदद करे, कौशल प्रशिक्षण दे और रोजगार से जोड़े, तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ सकता है।
रोजगार की राह ही असली सशक्तिकरण
आज झारखंड की जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जहां महिला केवल योजना की लाभार्थी बनकर न रह जाए, बल्कि वह खुद रोजगार देने वाली बन सके। सरकार को हर जिले की जरूरत के हिसाब से महिला रोजगार नीति बनानी चाहिए। कहीं कृषि आधारित उद्योग विकसित किए जा सकते हैं, कहीं वन उत्पाद, हस्तशिल्प, तसर, लाह, फूड प्रोसेसिंग और डिजिटल सेवाओं के माध्यम से महिलाओं को जोड़ा जा सकता है।
मंईयां सम्मान योजना को लेकर राजनीतिक बहस भी होती रही है। विपक्ष अक्सर ऐसी योजनाओं को चुनावी राजनीति से जोड़ता है और सवाल उठाता है कि क्या यह वोट बैंक को ध्यान में रखकर शुरू की गई योजना है। वहीं सरकार इसे महिलाओं के सम्मान और सामाजिक सुरक्षा की पहल बताती है। लोकतंत्र में दोनों पक्षों की अपनी-अपनी राय हो सकती है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल महिलाओं के भविष्य का है।
महिलाओं का भविष्य आत्मनिर्भरता में
महिलाओं को आर्थिक सहायता देना गलत नहीं है। गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए ऐसी योजनाएं जरूरी भी हैं। लेकिन किसी भी सरकार की लंबी सोच केवल सहायता देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सहायता के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और रोजगार के अवसर देना भी उतना ही जरूरी है।
क्योंकि किसी महिला को हर महीने पैसे देना उसे कुछ समय के लिए मजबूत बना सकता है, लेकिन उसे अपने पैरों पर खड़ा करना ही वास्तविक सम्मान होगा। मंईयां सम्मान योजना की सफलता तभी मानी जाएगी, जब झारखंड की महिलाएं केवल सरकारी सहायता पाने वाली नहीं, बल्कि अपनी मेहनत और हुनर से खुद की पहचान बनाने वाली आत्मनिर्भर नागरिक बनेंगी।